
12 बोतल कोरेक्स की जब्ती के बाद शुरू हुआ विवाद, आरोपी के पक्ष में थाने पहुंचे बंसीलाल साहू; थाना प्रभारी से तीखी बहस के बाद गेट पर बैठने का वीडियो वायरल
रीवा। शहर के सिविल लाइन थाने में नशीली कफ सिरप की कार्रवाई को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हो गया, जिसने पुलिस की कार्रवाई के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ पुलिस नशीली कफ सिरप की बरामदगी को आधार बनाकर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की बात कर रही है, वहीं भाजपा नेता बंसीलाल साहू आरोपी को निर्दोष बताते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग लेकर थाने पहुंच गए। इसके बाद पुलिस और भाजपा नेता के बीच हुई तीखी बातचीत ने पूरे घटनाक्रम को विवाद में बदल दिया।
कार्रवाई हुई तो आरोपी के समर्थन में थाने पहुंची भीड़
मामले की शुरुआत सिविल लाइन पुलिस की उस कार्रवाई से हुई, जिसमें पुलिस ने 12 बोतल कोरेक्स कफ सिरप जब्त कर पुणीत साहू उर्फ पंकज को हिरासत में लिया। कार्रवाई के बाद भाजपा नेता बंसीलाल साहू अपने समर्थकों के साथ थाने पहुंचे। उनका पक्ष था कि हिरासत में लिए गए युवक की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो और उसे केवल आरोप के आधार पर दोषी न माना जाए।लेकिन थाने में जिस मुद्दे को बातचीत और आवेदन तक सीमित रहना चाहिए था, वह धीरे-धीरे आमने-सामने के विवाद में बदल गया।
थाना प्रभारी से बातचीत बिगड़ी, मुख्य गेट पर बैठ गए भाजपा नेता
बताया जा रहा है कि बंसीलाल साहू और थाना प्रभारी विजय सिंह के बीच बातचीत के दौरान माहौल गर्म हो गया। दोनों के बीच तीखी बहस हुई और स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई जब भाजपा नेता थाने के मुख्य गेट पर बैठ गए।पुलिस ने उन्हें वहां से हटने के लिए कहा, जिसके बाद बहस और तेज हो गई। इसी दौरान का वीडियो सामने आने के बाद घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। वीडियो में दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक दिखाई दे रही है।
सवाल यह नहीं कि थाने कौन पहुंचा, सवाल यह है कि विवाद यहां तक क्यों पहुंचा?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर सवाल यही है कि एक आपराधिक मामले की जांच को लेकर शुरू हुई बातचीत थाने के मुख्य द्वार पर टकराव की स्थिति तक कैसे पहुंच गई।अगर पुलिस के पास आरोपी के खिलाफ पर्याप्त आधार हैं तो जांच और कानून की प्रक्रिया को अपना काम करना चाहिए। दूसरी तरफ किसी आरोपी के पक्ष में पहुंचे राजनीतिक व्यक्ति को भी अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन जब दोनों पक्षों के बीच संवाद की जगह टकराव दिखाई देने लगे, तब मामला केवल एक गिरफ्तारी का नहीं रह जाता।यह घटनाक्रम पुलिस और राजनीतिक प्रभाव के बीच उस महीन रेखा पर भी सवाल खड़ा करता है, जिसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्पष्ट रहना जरूरी है।
वर्दी और सियासत आमने-सामने हो तो संदेश गलत जाता है
पुलिस का काम अपराध की जांच करना और कानून के मुताबिक कार्रवाई करना है। राजनीतिक पद पर मौजूद व्यक्ति यदि किसी मामले में हस्तक्षेप या निष्पक्ष जांच की मांग करता है तो उसकी बात सुनना अलग विषय है, लेकिन जांच की दिशा तय करना पुलिस की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।इसी तरह पुलिस कार्रवाई के नाम पर किसी भी व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए जिससे वह खुद को अपमानित या दबाव में महसूस करे।सिविल लाइन थाने का घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सवाल केवल 12 बोतल कफ सिरप और एक आरोपी तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या किसी आरोपी के मामले में राजनीतिक सिफारिश पुलिस की कार्रवाई को प्रभावित कर सकती है और क्या पुलिस ऐसी किसी सिफारिश के सामने बिना दबाव के कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है?
वीडियो वायरल, अब वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका अहम
घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। पूरे घटनाक्रम की निष्पक्षता से समीक्षा की जानी चाहिए। थाने में मौजूद सीसीटीवी फुटेज, वायरल वीडियो और मौके पर मौजूद लोगों के बयान से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि विवाद की शुरुआत किस बात से हुई और स्थिति किसके कारण बिगड़ी।साथ ही नशीली कफ सिरप की बरामदगी और हिरासत में लिए गए युवक की भूमिका की जांच भी पूरी पारदर्शिता के साथ सामने आनी चाहिए। यदि आरोपी के खिलाफ कार्रवाई सही है तो पुलिस को तथ्य सामने रखने चाहिए और यदि जांच में कोई कमी है तो उसे भी छिपाया नहीं जाना चाहिए।
रीवा में असली परीक्षा कानून की है
यह पूरा घटनाक्रम भाजपा नेता बनाम पुलिस की लड़ाई बनकर खत्म नहीं होना चाहिए। असली परीक्षा कानून की है। पुलिस को यह साबित करना होगा कि कार्रवाई किसी दबाव में नहीं बल्कि साक्ष्यों के आधार पर हुई है, जबकि राजनीतिक पक्ष को भी यह स्पष्ट करना होगा कि आरोपी के समर्थन में खड़े होने का अर्थ जांच की दिशा प्रभावित करना नहीं है।
थाने की चौखट पर जब वर्दी और सियासत आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है, तो उसका असर सिर्फ वहां मौजूद लोगों तक नहीं रहता—उसकी गूंज पूरे शहर में जाती है।
अब निगाह इस बात पर है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इस पूरे विवाद को किस नजरिए से देखते हैं और नशीली कफ सिरप के मूल मामले से लेकर थाने में हुए टकराव तक, कार्रवाई कानून के हिसाब से होती है या फिर यह मामला भी आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में उलझकर रह जाता है।
