
कथित मारपीट, अभद्रता और धमकी के मामले में जांच की दिशा अब भी अस्पष्ट; पत्रकार समुदाय बोला—सवाल पूछना अपराध नहीं, सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी
रीवा। पत्रकार अजय मिश्रा के साथ कथित मारपीट, गाली-गलौज और धमकी से जुड़े मामले में घटना के चार दिन बाद भी पुलिस की ओर से ऐसी कार्रवाई सामने नहीं आई है, जिससे प्रकरण की जांच को लेकर स्थिति साफ हो सके। पुलिस की ओर से अब तक की गई कार्रवाई और विवेचना की दिशा को लेकर सार्वजनिक स्तर पर स्पष्ट जानकारी नहीं होने से मामला लगातार चर्चा में है।घटना के बाद पत्रकार समुदाय को उम्मीद थी कि पुलिस इसे गंभीरता से लेते हुए तत्काल उपलब्ध साक्ष्यों को अपने कब्जे में लेगी, प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ करेगी और पूरे घटनाक्रम की तह तक पहुंचेगी। लेकिन चार दिन गुजर जाने के बाद भी कार्रवाई को लेकर तस्वीर साफ नहीं होने से पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।यहां मुद्दा केवल अजय मिश्रा के साथ कथित तौर पर हुए व्यवहार का नहीं है। सवाल उस माहौल का भी है जिसमें पत्रकार अपने काम के दौरान घटनास्थल पर जाकर खबर जुटाता है, सवाल करता है और व्यवस्था के सामने जनता की आवाज रखता है। यदि किसी रिपोर्टिंग या सवाल को लेकर पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार अथवा हिंसा होती है, तो ऐसे मामले में प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
जांच हुई तो सामने क्यों नहीं आ रही तस्वीर?
मामले में पुलिस के सामने कई ऐसे बिंदु हैं, जिनकी जांच से घटना की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। घटनास्थल के आसपास लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग, मौके पर मौजूद लोगों के बयान, मोबाइल से बनाए गए वीडियो और घटनाक्रम से जुड़े अन्य साक्ष्य जांच के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।ऐसे में सवाल है कि इन साक्ष्यों को सुरक्षित करने की कार्रवाई कहां तक पहुंची? घटना के प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ हुई या नहीं? जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, उनसे पुलिस ने पूछताछ की अथवा नहीं? और यदि जांच आगे बढ़ रही है तो उसकी प्रगति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं दिखाई दे रही?
सबसे बड़ा सवाल—क्या पत्रकार होने की कीमत चुकानी पड़ेगी?
पत्रकारिता का मूल काम ही सवाल करना है। सत्ता हो, प्रशासन हो या कोई प्रभावशाली व्यक्ति—पत्रकार का दायित्व है कि वह घटनाओं को सामने लाए और जनता से जुड़े सवाल पूछे। सवाल किसी को पसंद आए या न आए, उसका जवाब कानून के दायरे में होना चाहिए।अजय मिश्रा प्रकरण ने इसी बिंदु को फिर सामने ला दिया है। पत्रकारों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि फील्ड में काम करने वाले पत्रकार को कथित तौर पर धमकी या मारपीट का सामना करना पड़े और उसके बाद भी कार्रवाई स्पष्ट न हो, तो भविष्य में पत्रकार किस भरोसे के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाएगा?
पुलिस-प्रशासन से जवाब की अपेक्षा
मामले में पत्रकार समुदाय की अपेक्षा सीधी है—जांच किसी व्यक्ति के प्रभाव या दबाव से नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर हो। जो साक्ष्य मौजूद हैं, उनकी निष्पक्ष पड़ताल की जाए। प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जाएं। संबंधित पक्षों से पूछताछ हो और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।चार दिन का समय कम नहीं होता, खासकर तब जब मामला पत्रकार की सुरक्षा से जुड़ा हो। इसलिए अब निगाहें इस बात पर हैं कि पुलिस कब तक जांच की वास्तविक स्थिति सामने रखती है और कब तक मामले में दिखाई देने वाली कार्रवाई होती है।
अजय मिश्रा प्रकरण में असली परीक्षा अब पुलिस की है—क्या जांच केवल कागजों तक सीमित रहेगी या घटनाक्रम के प्रत्येक पहलू की पड़ताल कर सच को सामने लाया जाएगा।
क्योंकि लोकतंत्र में पत्रकार से असहमति रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन पत्रकार को सवाल पूछने से रोकने का अधिकार किसी को नहीं। यदि किसी पत्रकार के साथ कथित ज्यादती होती है तो निष्पक्ष कार्रवाई केवल उस पत्रकार के लिए न्याय नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय के भरोसे की रक्षा भी है।
