सराधना में नर्सिंग स्कूल या छात्रों के भविष्य से खिलवाड़?

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फीस ली, पढ़ाई कराई और फिर संस्थान सील! छात्रों का आरोप—अब फीस वापसी के बजाय दोबारा वसूली का दबाव

अजमेर। नर्सिंग की पढ़ाई कर अपने पैरों पर खड़े होने का सपना लेकर सराधना पहुंचे विद्यार्थियों के सामने अब ऐसा सवाल खड़ा है, जिसका जवाब सिर्फ संस्थान संचालकों को नहीं, बल्कि जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों को भी देना होगा। छात्रों ने आरोप लगाया है कि उनसे मोटी फीस लेकर सराधना में नर्सिंग की पढ़ाई कराई गई, लेकिन बाद में संस्थान पर कार्रवाई हुई और परिसर सील कर दिया गया। अब विद्यार्थी अपनी फीस और भविष्य—दोनों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

छात्रों का आरोप है कि उन्होंने संस्थान में दो वर्ष की पढ़ाई के लिए प्रति वर्ष करीब 60 हजार रुपए फीस जमा की। पढ़ाई चलती रही और विद्यार्थियों को यह भरोसा रहा कि जिस संस्थान में उनका दाखिला हुआ है, वहां से उनकी नर्सिंग शिक्षा विधिवत पूरी होगी। लेकिन बाद में सराधना स्थित परिसर सील होने के बाद मामला उलझ गया।

सराधना से कायड़ भेजे गए छात्र, लेकिन फीस का हिसाब कौन देगा?

छात्रों के मुताबिक उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए कायड़ स्थित दूसरे संस्थान में भेजा गया। यहीं से विवाद ने नया मोड़ ले लिया। विद्यार्थियों का आरोप है कि वहां उनसे दोबारा दूसरे वर्ष की फीस मांगी जा रही है।

सवाल सीधा है—एक ही पढ़ाई के लिए छात्र दो जगह फीस क्यों दें?

अगर सराधना में ली गई फीस वैध थी तो उसका हिसाब कौन देगा? और अगर वहां संचालन ही नियमों के विपरीत था तो छात्रों को वहां पढ़ने की अनुमति आखिर किसने दी?

तीन कमरों के मकान में नर्सिंग शिक्षा?

छात्रों ने प्रशासन के सामने सराधना में संचालित संस्थान की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि जिस परिसर में उन्हें पढ़ाया जा रहा था, वह महज तीन कमरों का किराए का मकान था।

अगर यह दावा सही है तो सवाल केवल फीस का नहीं है। सवाल यह है कि नर्सिंग जैसे संवेदनशील व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए आवश्यक भवन, प्रयोगशाला, प्रशिक्षण व्यवस्था और अन्य मानकों की जांच किस स्तर पर हुई?

क्या सिर्फ नाम और बोर्ड लग जाने से कोई जगह नर्सिंग स्कूल बन जाती है?

पता बदला तो सराधना में पढ़ाई क्यों?

मामले का सबसे गंभीर पहलू संस्थान के पते को लेकर सामने आया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार मई 2024 में संस्थान का अधिकृत पता कायड़ स्थित आदित्य भवन किया गया था, जबकि छात्रों का आरोप है कि उन्हें सराधना में पढ़ाया जाता रहा।

यहीं से कई सवाल जन्म लेते हैं—

अगर अधिकृत पता कायड़ था तो सराधना में कक्षाएं किस अनुमति से चल रही थीं?

अगर सराधना अधिकृत परिसर नहीं था तो वहां विद्यार्थियों से फीस लेकर पढ़ाई क्यों कराई गई?

और अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक था तो परिसर सील होने की नौबत क्यों आई?

इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आएगा।

मूल दस्तावेज रोकने का आरोप, छात्रों में आक्रोश

छात्रों ने यह भी आरोप लगाया है कि फीस को लेकर विवाद के बीच उनके मूल दस्तावेज रोकने का दबाव बनाया जा रहा है। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला और गंभीर हो जाता है, क्योंकि विद्यार्थियों के मूल शैक्षणिक दस्तावेज उनके भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।

छात्रों ने प्रशासन से मांग की है कि उनके दस्तावेज सुरक्षित रूप से वापस दिलाए जाएं और फीस संबंधी विवाद का निष्पक्ष समाधान कराया जाए।

कलेक्टर-एसपी तक पहुंचा मामला

आक्रोशित छात्रों ने जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन तक अपनी शिकायत पहुंचाकर पूरे मामले की जांच की मांग की है। छात्रों की मांग है कि फीस वसूली, संस्थान की मान्यता, संचालन स्थल, छात्रों को दी गई शिक्षा और बाद में परिसर सील होने की पूरी प्रक्रिया की जांच हो।

छात्रों ने संबंधित व्यक्तियों पर कार्रवाई और जमा फीस वापस दिलाने की भी मांग की है।

अब असली परीक्षा प्रशासन की

यह मामला सिर्फ कुछ विद्यार्थियों की फीस का नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें नर्सिंग जैसे पेशे में प्रवेश लेने वाले युवाओं को यदि बिना स्पष्ट मान्यता या अधिकृत व्यवस्था के पढ़ाया गया, तो उनके भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?

विद्यार्थी फीस भरता है, प्रवेश लेता है, दो साल पढ़ाई करता है और अंत में पता चलता है कि संस्थान ही विवादों में है—तो फिर गलती किसकी है?

छात्र की या उस व्यवस्था की, जिसने संस्थान को चलने दिया?

अब जरूरत केवल जांच की घोषणा की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि सराधना में संस्थान किसकी अनुमति से चला, किसने निरीक्षण किया, किस आधार पर छात्रों से फीस ली गई और आखिर छात्रों के भविष्य के साथ हुए इस कथित खेल का जिम्मेदार कौन है।

यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई जरूरी है, जिससे भविष्य में कोई भी निजी शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों के सपनों और फीस को अपनी कमाई का साधन न बना सके।

क्योंकि सवाल सिर्फ 60 हजार रुपये की फीस का नहीं है—सवाल उन छात्रों के भविष्य का है, जिन्होंने नर्स बनने का सपना लेकर फीस जमा की थी।

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