राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में स्पष्ट कहा कि “धर्म किसी व्यक्ति की अपनी पसंद है, किसी को भी ज़बरदस्ती धर्मांतरित नहीं किया जाना चाहिए। यह बंद होना चाहिए।”
यह बात हर हिंदू को गहराई से समझनी होगी। भारत भूमि सहिष्णुता और आध्यात्मिकता की जननी है। यहाँ हजारों वर्षों से अनेक पंथ और मत पनपे हैं। लेकिन सहिष्णुता का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी जड़ों से कट जाएँ या जबरन धर्मांतरण जैसी कुप्रथाओं को सहन करते रहें।
धर्मांतरण रोकना समय की माँग
धर्मांतरण सिर्फ आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज की एकता और राष्ट्र की अखंडता के लिए खतरा है। यदि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी संस्कृति और धर्म से दूर हो जाएँगी तो राष्ट्र की पहचान भी खतरे में पड़ जाएगी। हमें जागरूक होकर हर उस ताक़त का विरोध करना होगा जो छल, प्रलोभन या दबाव डालकर धर्म परिवर्तन कराती है।
घुसपैठ राष्ट्र के लिए संकट
डॉ. भागवत ने दूसरा बड़ा मुद्दा घुसपैठ पर उठाया। हर देश के अपने कानून, सीमित संसाधन और रोज़गार होते हैं। यदि बाहर से अनियंत्रित घुसपैठ होगी तो देश की सुरक्षा, रोज़गार और संस्कृति सभी पर संकट आएगा। हमें यह समझना होगा कि घुसपैठ केवल आर्थिक बोझ नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।
हिंदुओं की एकता ही समाधान
आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत है कि हिंदू समाज अपनी एकता को मज़बूत करे। हमें जाति, क्षेत्र और छोटे-छोटे भेद भूलकर एकजुट होना होगा। जो शक्ति हमारे पूर्वजों ने हमें दी है, उस पर गर्व करना होगा और उसका संरक्षण करना होगा।
रोजगार और आत्मनिर्भरता
भागवत जी ने यह भी कहा कि सरकार नागरिकों को रोज़गार देने के प्रयास कर रही है। एक मज़बूत राष्ट्र वही होता है जहाँ नागरिक आत्मनिर्भर हों। यदि हम अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएंगे तो भारत न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी विश्वगुरु बन सकता है।
यह समय है जब हम नींद से जागें। धर्म और राष्ट्र पर होने वाले हर प्रहार के खिलाफ हमें संगठित होकर खड़ा होना होगा। यह केवल सरकार का काम नहीं, बल्कि हर हिंदू की जिम्मेदारी है कि वह अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा करे।
जागो हिंदू, अपनी आस्था और अपनी मातृभूमि की रक्षा करो। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।
