कायस्थ समाज में ऋषि पंचमी का महत्व, क्यों बांधी जाती है राखी?

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अजमेर। भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाने वाली ऋषि पंचमी पूरे देश में सप्तऋषियों की स्मृति और व्रत के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन कायस्थ समाज के लिए यह दिन एक अलग ही महत्व रखता है। जहाँ अधिकांश समाज रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) को बहन-भाई का पर्व मानकर राखी बाँधता है, वहीं कायस्थ परिवारों में यह परंपरा ऋषि पंचमी को निभाई जाती है।

कायस्थ समाज और ऋषि परंपरा

चित्रगुप्त महाराज

कायस्थ समाज की उत्पत्ति चित्रगुप्त जी से मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चित्रगुप्त जी ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। यही कारण है कि कायस्थ अपने आराध्य को ऋषि तुल्य मानते हैं। ऋषि पंचमी के दिन चित्रगुप्त जी की विशेष पूजा,आराधना की जाती है।

राखी बांधने की अनूठी परंपरा

इसके पीछे मान्यता है कि जब अन्य समाजों में राखी का पर्व श्रावण पूर्णिमा को ब्राह्मणों के यज्ञोपवीत और रक्षा सूत्र से जुड़ा था, तो कायस्थों ने अपनी ऋषि परंपरा को जीवित रखने हेतु पंचमी को ही रक्षा पर्व माना जाता है ।

इस दिन बहने अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधकर भाई की लंबी उम्र और सुरक्षा का आशीर्वाद के साथ धर्म, न्याय और ऋषियों की परंपरा की रक्षा का संकल्प कराती हैं।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के अनेक कायस्थ परिवारों में आज भी यह परंपरा जीवित है।

इतिहासकारों का मानना है कि कायस्थ समाज ने हमेशा कलम और न्याय को महत्व दिया है। इसी कारण यह वर्ग अपने आराध्य चित्रगुप्त जी और ऋषियों से जुड़ी परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी संजोए हुए है।

बनारस, पटना और इलाहाबाद के कायस्थ परिवारों में आज भी बहनें राखी बांधने के लिए भादों मास की ऋषि पंचमी का ही इंतजार करती हैं।

कायस्थ विभूतियों का योगदान

कायस्थों ने देश और समाज के निर्माण में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

लाल बहादुर शास्त्री – भारत के दूसरे प्रधानमंत्री, जिनकी ईमानदारी और सादगी ने पूरे देश को प्रेरित किया।

चंद्रशेखर आज़ाद – महान क्रांतिकारी, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति दी।

मुंशी प्रेमचंद – हिंदी साहित्य के महान उपन्यासकार, जिन्होंने समाज की सच्चाइयों को कलम से जीवंत किया।

जयप्रकाश नारायण – सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता, जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया।

इन विभूतियों ने केवल अपने परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे देश और समाज की रक्षा, सुधार और विकास का बीड़ा उठाया। यही भाव ऋषि पंचमी पर राखी बांधने की परंपरा में भी समाहित है – कि भाई केवल बहन की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि धर्म, समाज और राष्ट्र की रक्षा का भी संकल्प ले।

धर्माचार्य मानते हैं कि ऋषि पंचमी को राखी बाँधना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कायस्थ समाज की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। यह परंपरा दर्शाती है कि कायस्थ अपने आराध्य चित्रगुप्त को सप्तऋषियों की परंपरा का संवाहक मानकर चलते हैं।

इस प्रकार कायस्थ समाज में ऋषि पंचमी का पर्व राखी और ऋषियों दोनों की परंपरा को जोड़ता है। यह परंपरा न केवल भाई-बहन के रिश्ते को मजबूती देती है, बल्कि धर्म, न्याय और समाज की रक्षा का संकल्प भी जगाती है।

जय चित्रांश

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