मुआवजा गुलामी की निशानी – अजमेर का कड़वा सच

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Compensation is a sign of slavery – The bitter truth of Ajmer

अजमेर इस वक्त बाढ़ की त्रासदी से जूझ रहा है। हजारों घर पानी में बह गए, अनगिनत परिवार बेघर हो गए। मगर सवाल यह है कि क्या इस त्रासदी का जिम्मेदार सिर्फ आसमान से बरसा पानी है, या इंसान का लालच और सरकार की चुप्पी भी उतनी ही बड़ी वजह है?

तालाबों पर बसा अजमेर – त्रासदी की जड़

अजमेर की पहचान तालाबों और झीलों से रही है। आनासागर, फॉयसागर, फॉयसागर, पुष्कर, बोराज ,खानपुरा,गोविंदगढ़ आदि बाडी नदी सहित छोटे बड़े कई तालाब हैं । इन जलाशयों के कारण ही यह शहर जीवन और हरियाली से भरा रहता था। मगर पिछले तीन दशकों में जनता का लालच + नेताओं और प्रशासन की मिलीभगत से इन तालाबों की जमीनों पर कॉलोनियां,बस्तियां खड़ी हो गईं। यह सब इन दशकों में ही हुआ,यह लोग कहां से आए कौन है अधिकांश की जानकारी तक प्रशासन के पास नहीं । हाल ही अजमेर में अवैध रूप से रह रहे लोगों को पकड़ा भी जा चुका है ।
नगर निगम ने मकान बनाने की इजाजत दी या नहीं ? इसकी जानकारी तक गुप्त है,जो एक बड़ी जांच होनी जरूरी है । नेताओं ने वोट बैंक के लिए आंखें मूंद लीं, और आज हालात यह हैं कि तालाबों की गोद में बसाए गए घर पानी की कैद में डूब रहे हैं।

मुआवजे का खेल – जनता की गुलामी

जब आपदा आती है, तब नेताजी का होनहार दत्तक पुत्र जनता के लिए मुआवजे की मांग कर सरकार से जनता को मुआवज दिलाकर गुलामी को मजबूत कर देते है। किसी को 5 हजार, किसी को 25 हजार, किसी को 1 लाख…। और जनता मजबूरी में यही समझ लेती है कि सरकार ने “बड़ा काम” कर दिया।

असल में हमारे देश की जनता को शायद यह नहीं पता कि नेताजी जी जिस मुआवजे को देकर आपको गुलाम बनाते हैं,असल में वह पैसा जनता की गाढ़ी कमाई से लिया गया टेक्स का पैसा है जिसे नेताजी अपना बताकर फोटो खिंचवाते आए और जनता मूर्ख बन नेताजी जी की जय बुलाते आ रहे ।
असल में यह मुआवजा राहत नहीं, बल्कि गुलामी का प्रतीक है। सरकार अपनी गलती छिपाने और जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए पैसे का टुकड़ा फेंकती है। वोटों के वक्त यही जनता फिर उसी नेता को फूलों और चांदी से तोलती है जिसने उनकी जिंदगी उजाड़ दी थी।

ट्रिपल इंजन सरकार पर सवाल

अजमेर में बीजेपी की ट्रिपल इंजन सरकार है—केंद्र, राज्य और निगम—तीनों जगह भाजपा का राज। मगर जब बाढ़ आई तो जनता को तैरने के लिए छोड़ा गया। नेता फोटो खिंचवाने पहुंचे, मगर असल में राहत शिविरों, पुनर्वास और वैकल्पिक योजनाओं पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
अगर सरकार ईमानदार होती, तो तालाबों पर बने घरों को खाली करवाकर, शहर से दूर सुरक्षित इलाकों में फ्लैट बनवाकर लोगों को बसाती। ताकि आने वाली पीढ़ियां इस त्रासदी का शिकार न हों। लेकिन वोट बैंक की राजनीति में ऐसा करना किसी सरकार की प्राथमिकता नहीं क्योंकि असल खेल जनता को गुलाम बनाए रखने का है ।

जनता की गुलामी या जागृति?

आज संतों की वाणी सच साबित हो रही है—धरती जलमग्न हो रही है क्योंकि इंसान ने प्रकृति से खिलवाड़ किया है। लेकिन असली सवाल यह है कि जनता कब तक इस गुलामी को स्वीकार करती रहेगी?
क्या जनता हर बार अपना सब कुछ खोकर सिर्फ मुआवजे की बैसाखी पर जिंदा रहेगी? या फिर नेताओं से सवाल पूछकर स्थायी समाधान की मांग करेगी?

अजमेर की बाढ़ सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, यह प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक मिलीभगत का नतीजा है। तालाबों में बसे घर बाढ़ में डूबेंगे ही, और मुआवजे की राजनीति जनता को गुलाम बनाए रखेगी।
जरूरत है कि मुआवजे की जगह स्थायी पुनर्वास योजना बने, तालाबों की जमीनें कब्जामुक्त हों और जनता नेताओं से हिसाब मांगे। वरना यह चक्र ऐसे ही चलता रहेगा—बाढ़ आएगी, घर डूबेंगे, मुआवजा मिलेगा, और नेता चांदी से तोले जाएंगे।

👉 खबर वन निष्कर्ष

अजमेर की बाढ़ सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, यह प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक मिलीभगत का नतीजा है। तालाबों में बसे घर बाढ़ में डूबेंगे ही, और मुआवजे की राजनीति जनता को गुलाम बनाए रखेगी।
जरूरत है कि मुआवजे की जगह स्थायी पुनर्वास योजना बने, तालाबों की जमीनें कब्जामुक्त हों और जनता नेताओं से हिसाब मांगे। वरना यह चक्र ऐसे ही चलता रहेगा—बाढ़ आएगी, घर डूबेंगे, मुआवजा मिलेगा, और नेता चांदी से तोले जाएंगे।

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