अजमेर के मेयर चुनाव में आखिरी गेंद का इंतजार, पाला बदलने की चर्चाओं के बीच जनता का सीधा सवाल—हमने आपको अपना प्रतिनिधि चुना था, अपना भरोसा गिरवी रखने के लिए नहीं
अजमेर में मेयर चुनाव की पिच तैयार है। भाजपा और कांग्रेस दोनों अपनी-अपनी टीम लेकर मैदान में हैं। स्कोर का हिसाब चल रहा है, विकेट बचाए जा रहे हैं और आखिरी गेंद के लिए रणनीति बनाई जा रही है। बाहर से देखने पर पूरा मुकाबला क्रिकेट मैच जैसा रोमांचक लग रहा है, लेकिन इस मैच का स्कोर सिर्फ राजनीतिक दलों का नहीं, अजमेर के भविष्य का है।
राजस्थान की राजनीति में चुनावी मौसम के साथ पाला बदलने और समर्थन बदलने की खबरें भी चर्चा में रहती हैं। कहीं कोई इधर जाता दिखाई देता है, कहीं उधर समर्थन की चर्चा होती है और कहीं बंद कमरों में राजनीतिक गणित बैठाया जाता है। जनता यह सब देख रही है और मन ही मन पूछ रही है—“पार्षद जी, यह राजनीति है या क्रिकेट की जर्सी? सुबह एक टीम और शाम को दूसरी टीम!”
मजाक अपनी जगह है, लेकिन सवाल गंभीर है। पार्षद को जनता ने चुना है। टिकट किसी राजनीतिक दल ने दिया हो सकता है, लेकिन वोट जनता ने दिया है। इसलिए यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि अपना राजनीतिक रुख या समर्थन बदलता है तो जनता का सवाल स्वाभाविक है—“हमने आपको अपना प्रतिनिधि चुना था या अपना भरोसा गिरवी रखने के लिए?”
बेशक, किसी जनप्रतिनिधि को अपना राजनीतिक निर्णय लेने का अधिकार है। विचार बदलना या किसी मुद्दे पर अलग रुख अपनाना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी फैसले पर लालच, दबाव या निजी लाभ के आरोप लगते हैं तो जनता को सवाल पूछने का भी पूरा अधिकार है। आरोप हो तो प्रमाण सामने आने चाहिए और जनप्रतिनिधि को भी अपने निर्णय का कारण जनता के सामने रखने में संकोच नहीं होना चाहिए।
क्योंकि यह क्रिकेट नहीं है कि खिलाड़ी जर्सी बदलकर अगली गेंद पर नई टीम के लिए बल्लेबाजी करने लगे और दर्शक तालियां बजाकर घर चले जाएं। राजनीति में जर्सी बदलने के साथ जनता का भरोसा भी जवाब मांगता है।
चुनाव के समय यही पार्षद घर-घर गए थे। किसी ने हाथ जोड़कर वोट मांगा, किसी ने विकास का वादा किया, किसी ने कहा—“आपकी आवाज नगर निगम में उठाऊंगा।” जनता ने भरोसा किया और मतदान की मुहर लगा दी। अब यदि चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण बदलते हैं तो सवाल तो बनता है—“हमारे वोट की इज्जत कहां है?”
यह सवाल भाजपा के पार्षद से भी है और कांग्रेस के पार्षद से भी। निर्दलीय से भी और किसी अन्य दल से चुने गए प्रतिनिधि से भी। सवाल किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष का नहीं, जनता के अधिकार और जवाबदेही का है।
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मेयर चुनाव की आखिरी गेंद पर कौन-सा राजनीतिक शॉट खेला जाएगा, यह पार्षद तय करेंगे। लेकिन चुनाव के बाद जनता को भी अपना स्कोरकार्ड बनाना चाहिए। किसने क्या कहा? किस मुद्दे पर क्या रुख लिया? किसके साथ खड़ा हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण—अपने वार्ड के लिए क्या किया?
जनता को किसी राजनीतिक दल की जय-जयकार करने से ज्यादा जरूरी है अपने अधिकारों की निगरानी करना। पार्षद को याद दिलाते रहना चाहिए कि वह पांच साल के लिए जनता से ऊपर नहीं हुआ है। वह जनता के बीच से चुना गया है और उसी जनता के प्रति जवाबदेह है।
इसलिए अगली बार जब कोई पार्षद आपके दरवाजे पर वोट मांगने आए तो सवाल जरूर कीजिए—“पार्षद जी, पिछली बार हमने आपको अपना वोट दिया था। बताइए, उस वोट की इज्जत आपने कितनी रखी?”
और यदि किसी निर्णय पर कोई गंभीर आरोप है तो गुस्से या अफवाह के बजाय प्रमाण मांगिए। शिकायत है तो उचित मंच पर उठाइए। रिकॉर्ड देखिए। सवाल कीजिए। क्योंकि जागरूक नागरिक वही है जो न अंधा समर्थन करता है, न अंधा विरोध।
मैच चाहे कोई जीते, जनता को अपना हिसाब नहीं भूलना चाहिए।
जर्सी कोई भी हो, पार्टी कोई भी हो, पार्षद कोई भी हो—वोट जनता का है और जवाबदेही भी जनता के प्रति ही होनी चाहिए।
आखिरकार मेयर चुनाव की आखिरी गेंद पर स्कोरबोर्ड तो बदल जाएगा, लेकिन उसके बाद असली पारी शुरू होगी—अजमेर की जनता की।
