⚖️ कानून जानिए, अधिकार पहचानिए
अजमेर। नगर निकाय चुनाव के बाद अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसने वार्ड पार्षद का चुनाव ही नहीं लड़ा, नगर परिषद का अध्यक्ष या नगर पालिका का सभापति बन सकता है? राजस्थान के कानून में इसका उत्तर हाँ है, लेकिन इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और पात्रता पूरी करना अनिवार्य है।
जनता सीधे अध्यक्ष नहीं चुनती
राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 तथा राजस्थान नगरपालिका (निर्वाचन) नियम, 1994 के प्रावधानों के अनुसार अध्यक्ष/सभापति का निर्वाचन नगरपालिका के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है। इसलिए इसे “बिना चुनाव अध्यक्ष बनना” कहना सही नहीं होगा। सही स्थिति यह है कि बिना पार्षद का चुनाव लड़े कोई पात्र व्यक्ति अध्यक्ष पद के लिए निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुना जा सकता है।
नियम 78 में क्या प्रावधान है?
राजस्थान नगरपालिका (निर्वाचन) नियम, 1994 के संशोधित नियम 78 के अनुसार अध्यक्ष पद के लिए वह व्यक्ति पात्र हो सकता है जो नगरपालिका का सदस्य बनने की निर्धारित योग्यताएं रखता हो और कानून के तहत किसी अयोग्यता से ग्रस्त न हो।
अर्थात अध्यक्ष बनने के लिए पहले किसी वार्ड से पार्षद निर्वाचित होना अनिवार्य शर्त नहीं है।
हालांकि उम्मीदवार को नगरपालिका सदस्य के लिए निर्धारित वैधानिक योग्यताएं पूरी करनी होंगी। साथ ही अध्यक्ष पद यदि SC, ST, OBC अथवा महिला सहित किसी वर्ग के लिए आरक्षित है, तो उस आरक्षण की पात्रता भी पूरी करना आवश्यक होगी।
एक उदाहरण से समझिए
मान लीजिए किसी नगर परिषद में 60 वार्ड हैं। सभी वार्डों से पार्षद निर्वाचित हो गए। अब अध्यक्ष पद के लिए कोई ऐसा पात्र व्यक्ति सामने आता है जिसने वार्ड पार्षद का चुनाव नहीं लड़ा।
यदि वह कानून के अनुसार पात्र है और अध्यक्ष पद के आरक्षण की शर्तें पूरी करता है, तो उसका नाम अध्यक्ष पद के निर्वाचन में आ सकता है। इसके बाद निर्वाचित पार्षद मतदान/निर्धारित निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से अध्यक्ष का चुनाव करते हैं।
इसलिए जनता को यह समझना जरूरी है कि यह नियुक्ति नहीं बल्कि कानून के तहत होने वाला निर्वाचन है।
अध्यक्ष बनने के बाद क्या अधिकार हैं?
किसी गैर-पार्षद व्यक्ति के अध्यक्ष निर्वाचित हो जाने के बाद उसके अधिकार केवल इसलिए कम नहीं हो जाते कि उसने वार्ड का चुनाव नहीं लड़ा था। विधि के अनुसार निर्वाचित अध्यक्ष को अध्यक्ष पद से जुड़े वैधानिक अधिकार और दायित्व प्राप्त होते हैं।
राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 की धारा 48 के अंतर्गत अध्यक्ष के प्रमुख दायित्वों में नगरपालिका की बैठकों को बुलाना, बैठकों की अध्यक्षता करना तथा नगरपालिका के वित्तीय और कार्यपालिका प्रशासन पर निगरानी रखना जैसे कार्य शामिल हैं। अध्यक्ष को अधिनियम और नियमों द्वारा सौंपे गए अन्य कार्य भी करने होते हैं।
लेकिन अध्यक्ष सर्वशक्तिमान नहीं
यह भी समझना जरूरी है कि अध्यक्ष नगरपालिका का सर्वोच्च निरंकुश अधिकारी नहीं होता। नगरपालिका का संचालन अधिनियम, नियमों, निर्वाचित परिषद, समितियों और अधिकारियों के निर्धारित अधिकार-क्षेत्र के अनुसार होता है।
अध्यक्ष को भी कानून और परिषद के वैधानिक निर्णयों के अनुरूप कार्य करना होता है।
पद पर भी कानून का नियंत्रण
अध्यक्ष का पद निर्वाचित होने के बाद भी कानून से ऊपर नहीं है। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम में अध्यक्ष/उपाध्यक्ष के विरुद्ध निर्धारित परिस्थितियों और प्रक्रिया के तहत अविश्वास प्रस्ताव की व्यवस्था भी है।
इसलिए किसी व्यक्ति का गैर-पार्षद होते हुए अध्यक्ष बनना कानून में संभव है, लेकिन उसका पूरा कार्यकाल और अधिकार भी कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही रहते हैं।
⚖️ जनता के लिए सीधी बात
पार्षद का चुनाव जनता करती है।
अध्यक्ष का चुनाव निर्वाचित सदस्य करते हैं।
अध्यक्ष बनने के लिए पार्षद होना अनिवार्य नहीं है।
लेकिन पात्रता, आरक्षण और निर्वाचन की कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
इसलिए यदि चुनाव के बाद किसी व्यक्ति के अध्यक्ष पद पर आने की चर्चा हो तो जनता को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि “वह पार्षद है या नहीं?” बल्कि यह पूछना चाहिए कि “क्या वह कानून के अनुसार पात्र है, क्या पद उसके लिए आरक्षित वर्ग के अनुरूप है और क्या उसका निर्वाचन निर्धारित प्रक्रिया से हुआ है?”
कानून की जानकारी ही लोकतंत्र में नागरिक का सबसे बड़ा अधिकार और उसकी सबसे मजबूत जागरूकता है।
यह कानूनी जागरूकता के उद्देश्य से है ,किसी विशेष व्यक्ति की पात्रता का अंतिम निर्णय संबंधित निर्वाचन प्राधिकारी एवं लागू कानून/अदालत के आदेशों के आधार पर होगा।
