रीवा में सियासत की थाली पर उठे सवाल, 168 घंटे 7दिन से न्याय की लड़ाई लड़ता पिता और छप्पन भोग का वायरल वीडियो बना चर्चा का केंद्र

Spread the love

कल्पना प्रकरण में न्याय की मांग को लेकर पिता का संघर्ष जारी, दिग्विजय सिंह के रीवा दौरे के बीच सामने आए वीडियो ने राजनीतिक संवेदनशीलता पर खड़े किए तीखे सवाल; भोपाल में इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन से स्वास्थ्य व्यवस्था भी घेरे में

रीवा।। रीवा की सियासत में इन दिनों बयानबाजी से ज्यादा तस्वीरें और वीडियो सवाल खड़े कर रहे हैं। कल्पना प्रकरण में न्याय की मांग को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहे पिता का आंदोलन और इसी बीच सामने आया छप्पन भोग से जुड़ा कथित वीडियो अब राजनीतिक बहस का नया मुद्दा बन गया है। मामला उस समय और चर्चा में आ गया, जब कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पीड़ित परिवार से मुलाकात और न्याय की मांग को लेकर रीवा पहुंचे।एक ओर एक पिता अपनी बेटी के मामले में न्याय की उम्मीद लेकर लगातार संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर राजनीतिक विरोधियों ने सवालों की बौछार शुरू कर दी है। सवाल वीडियो में दिखाई देने वाली थाली का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संवेदना का है, जिसकी कसौटी पर अब नेताओं के सार्वजनिक आचरण को परखा जा रहा है।

168 घंटे 7दिन का संघर्ष, लेकिन सवाल अब भी कायम

कल्पना प्रकरण ने रीवा की राजनीति और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों को लंबे समय से प्रभावित किया है। पीड़ित पिता का कहना है कि न्याय मिलने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। भूख हड़ताल जैसे कठिन कदम के जरिए वह अपनी आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।ऐसे में जब कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा उनके समर्थन में रीवा पहुंचता है, तो स्वाभाविक रूप से उम्मीद बढ़ती है कि मामले को राजनीतिक मंच से आगे ले जाकर न्याय की ठोस लड़ाई में बदला जाएगा। लेकिन वायरल वीडियो ने इसी संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा कर दिया है।सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों का मूल यही है—क्या पीड़ित परिवार की पीड़ा केवल राजनीतिक बयान का विषय है या वास्तव में उसके दर्द को महसूस करने की जिम्मेदारी भी राजनीति की है?

दिग्विजय सिंह पहुंचे रीवा, लेकिन वीडियो ने बदल दिया विमर्श

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के रीवा पहुंचने को कांग्रेस की ओर से पीड़ित परिवार के समर्थन और सरकार पर दबाव बनाने की कवायद के रूप में देखा गया। लेकिन इसी दौरान सामने आए वीडियो ने पूरी चर्चा का रुख बदल दिया।वायरल वीडियो को लेकर राजनीतिक तंज कसने वालों का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में नेताओं की हर गतिविधि अब कैमरे की नजर में है। खासकर तब, जब दूसरी तरफ कोई परिवार न्याय की मांग को लेकर अपना सुख-चैन छोड़कर आंदोलन कर रहा हो।हालांकि वीडियो को लेकर लगाए जा रहे राजनीतिक दावों और उसके संदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है, लेकिन इतना जरूर है कि इसने रीवा की सियासत में ‘संवेदना बनाम सियासी प्रदर्शन’ की बहस को हवा दे दी है।

भोपाल का डॉक्टर आंदोलन, रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था फिर सवालों में

इसी बीच राजधानी भोपाल में इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन ने मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकार के सामने एक और चुनौती खड़ी कर दी है। स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे MBBS इंटर्न डॉक्टरों पर पुलिस कार्रवाई के बाद विरोध की आवाज इंदौर और ग्वालियर तक पहुंच गई है।भोपाल में आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज, वाटर कैनन और आंसू गैस के इस्तेमाल का डॉक्टरों की ओर से दावा किया गया है। आंदोलनकारी घायल इंटर्न डॉक्टरों के लिए मुआवजे और कार्रवाई के जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।इंदौर में डॉक्टरों ने पहले OPD और इमरजेंसी की जिम्मेदारी निभाई, इसके बाद आंदोलन का रास्ता अपनाया। अब सुबह 11 बजे के बाद OPD सेवाएं बंद करने का निर्णय आंदोलन को और तीखा रूप देने वाला कदम माना जा रहा है।

₹14,337 से ₹30 हजार स्टाइपेंड की मांग

इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि वर्तमान में उन्हें लगभग ₹14,337 प्रतिमाह स्टाइपेंड मिल रहा है, जिसे बढ़ाकर ₹30 हजार प्रतिमाह किए जाने की मांग है।डॉक्टरों का तर्क है कि इंटर्नशिप महज प्रशिक्षण की प्रक्रिया नहीं रह गई है। अस्पतालों में मरीजों की देखभाल और नियमित चिकित्सकीय कार्यों में इंटर्न डॉक्टरों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी के अनुरूप सम्मानजनक स्टाइपेंड मिलना चाहिए।भोपाल की पुलिस कार्रवाई के बाद अब आंदोलन की मांगों में घायल डॉक्टरों को ₹1.5 लाख सहायता, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और सरकार की ओर से लिखित आश्वासन भी प्रमुखता से शामिल हो गए हैं।

ग्वालियर में 200 से ज्यादा इंटर्न धरने पर

भोपाल के बाद ग्वालियर में भी आंदोलन ने जोर पकड़ लिया है। जयारोग्य अस्पताल परिसर में 200 से अधिक इंटर्न डॉक्टरों के धरने पर बैठने की जानकारी सामने आई है। जूनियर डॉक्टरों और PG डॉक्टरों के समर्थन से आंदोलन को और मजबूती मिली है।इमरजेंसी सेवाओं को जारी रखते हुए अन्य सेवाओं के प्रभावित होने की स्थिति ने साफ कर दिया है कि मामला अब केवल स्टाइपेंड की मांग तक सीमित नहीं रहा। पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही भी आंदोलन का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

स्वास्थ्य मंत्री के सामने दोहरी चुनौती

विरोध बढ़ने के बीच उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने गांधी मेडिकल कॉलेज और हमीदिया अस्पताल से जुड़े अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक के बाद सरकार की ओर से जांच का भरोसा दिया गया।बताया गया कि पुलिस कार्रवाई की जांच होगी और यदि किसी पुलिसकर्मी की भूमिका दोषपूर्ण पाई जाती है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। स्टाइपेंड बढ़ाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की वापसी के बाद अंतिम निर्णय की बात कही गई है।डॉक्टरों का रुख हालांकि फिलहाल सख्त है। उनका कहना है कि अब केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा, सरकार को लिखित निर्णय देना होगा।

सागर से रीवा तक स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल

प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में सामने आ रही घटनाओं ने स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर व्यापक बहस छेड़ दी है। सागर में शराब सेवन से हुई मौतों की घटनाओं से लेकर रीवा में अस्पतालों की व्यवस्थाओं और कथित चिकित्सकीय लापरवाही से जुड़े विवादों तक सरकार के सामने लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं।रीवा में संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय लंबे समय से मरीजों और उनके परिजनों की शिकायतों के कारण चर्चा में रहा है। इलाज में कथित लापरवाही, चिकित्सकों की उपलब्धता, अस्पताल प्रबंधन और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।ऐसे में प्रदेश की राजधानी से लेकर स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले तक उठ रही आवाजें एक ही सवाल की ओर इशारा करती हैं—क्या हर गंभीर घटना के बाद जांच और कमेटी ही अंतिम जवाब है, या व्यवस्था में ऐसी जवाबदेही भी तय होगी जिससे अगली घटना को रोका जा सके?

रीवा पूछ रहा है—सियासत बड़ी या संवेदना?

कल्पना के पिता का संघर्ष हो, भोपाल के इंटर्न डॉक्टरों का आंदोलन हो या प्रदेश के अस्पतालों से जुड़ी शिकायतें—इन सभी घटनाओं के केंद्र में एक ही अपेक्षा दिखाई देती है: व्यवस्था सुने और जिम्मेदारी तय करे।वायरल वीडियो ने इसी संवेदनशीलता को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। एक तरफ न्याय की मांग लेकर संघर्ष करता परिवार और दूसरी तरफ राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ी तस्वीरें—इन दोनों को साथ रखकर सोशल मीडिया पर सवाल पूछे जा रहे हैं।रीवा की जनता अब सिर्फ भाषण नहीं, जवाब और परिणाम चाहती है।क्योंकि सवाल यह नहीं कि किसकी थाली में कितने व्यंजन थे।सवाल यह है कि जिस पिता की थाली में 168घंटे 7दिनों से न्याय की प्रतीक्षा के अलावा कुछ नहीं है, उसकी आवाज आखिर कब तक राजनीति के शोर में दबती रहेगी?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *