1050 की ‘नो-रिफंड’ क्रॉस मैचिंग से लेकर हजारों में खून! रीवा के अथर्वन ब्लड बैंक पर गंभीर आरोपों के बाद कलेक्टर ने बैठाई जांच

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संजय गांधी अस्पताल में ब्लड बैंक और रक्तदान शिविरों के बावजूद मरीजों को निजी ब्लड बैंक की ओर भेजे जाने के आरोप; जरूरत पड़ी तो सीलिंग और FIR के निर्देश

रीवा। जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे मरीजों के लिए रक्त सबसे बड़ी जरूरत होता है। अस्पताल के बाहर खड़ा एक परिजन जब हाथ में पर्ची लिए रक्त की तलाश में भटकता है, तब उसके सामने कोई बाजार नहीं होता—सिर्फ अपने मरीज की जान बचाने की मजबूरी होती है। लेकिन रीवा में एक निजी ब्लड बैंक को लेकर सामने आई गंभीर शिकायतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।अथर्वन ब्लड बैंक में कथित अनियमितताओं और मरीजों से मनमानी वसूली की शिकायतों के बाद कलेक्टर ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। प्रशासनिक स्तर पर यह भी स्पष्ट किया गया है कि जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आने पर नियमों के अनुसार ब्लड बैंक को सील करने और एफआईआर दर्ज कराने जैसी कार्रवाई की जा सकती है।मामला अब केवल एक निजी संस्थान की जांच तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय की व्यवस्था और वहां से मरीजों को निजी ब्लड बैंक की ओर भेजे जाने के आरोपों को लेकर खड़ा हो गया है।

सरकारी अस्पताल में ब्लड बैंक, फिर मरीज निजी ब्लड बैंक क्यों?

संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय में स्वयं का ब्लड बैंक मौजूद है। यहां समय-समय पर रक्तदान शिविर आयोजित होते हैं और रक्त संग्रह की व्यवस्था भी रहती है।इसके बावजूद शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कई जरूरतमंद मरीजों और उनके परिजनों को सरकारी ब्लड बैंक से रक्त उपलब्ध कराने के बजाय निजी अथर्वन ब्लड बैंक की ओर भेजा जाता है।यह आरोप अगर जांच में सही पाया जाता है तो सवाल बेहद गंभीर है—जब सरकारी अस्पताल में रक्त की व्यवस्था मौजूद है, तो मरीजों को निजी संस्थान का रास्ता क्यों दिखाया जा रहा है?क्या सरकारी ब्लड बैंक में वास्तव में जरूरत के अनुसार रक्त उपलब्ध नहीं रहता, या फिर इसके पीछे कोई ऐसी व्यवस्था काम कर रही है, जिसकी परतें जांच के बाद खुलेंगी?यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब प्रशासनिक जांच से सामने आने की उम्मीद है।

₹1050 पहले जमा करो… फिर पता चलेगा रक्त मिलेगा या नहीं!

शिकायतों में सबसे गंभीर आरोप क्रॉस मैचिंग शुल्क को लेकर लगाए गए हैं।आरोप है कि अथर्वन ब्लड बैंक पहुंचने वाले मरीजों या उनके परिजनों से सबसे पहले ₹1050 क्रॉस मैचिंग के नाम पर जमा कराए जाते हैं और यह राशि कथित तौर पर वापस नहीं की जाती।शिकायतकर्ताओं के अनुसार, यदि किसी कारण से मरीज को वहां से रक्त नहीं भी मिल पाता या रक्त उपयोग में नहीं आता, तब भी जमा की गई रकम वापस नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई हैं।मरीज को रक्त मिला या नहीं—लेकिन उसकी जेब से पैसा पहले ही निकल गया!हालांकि शुल्क निर्धारण, उसकी वैधानिकता और रिफंड नीति की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

₹2500 से ₹5000 तक वसूली के आरोप, मरीज की मजबूरी पर सवाल

मामले में मरीजों के परिजनों ने रक्त के बदले ₹2500 से ₹5000 या उससे अधिक रकम वसूले जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।आरोप है कि गंभीर हालत में मरीज के सामने परिजनों के पास कोई विकल्प नहीं बचता। जब डॉक्टर इलाज के लिए तत्काल रक्त की जरूरत बताते हैं, तब परिवार पैसे को लेकर बहस नहीं करता—वह सिर्फ अपने मरीज को बचाना चाहता है।यही मजबूरी कथित तौर पर वसूली का आधार बन रही थी या नहीं, यह अब जांच का बड़ा विषय है।क्योंकि अस्पताल के बाहर खड़ा परिजन कीमत नहीं पूछता… वह सिर्फ इतना पूछता है—“ब्लड मिल जाएगा ना?”और जब सामने वाला जवाब रकम से शुरू करे, तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सिर्फ कैश का आरोप… डिजिटल रिकॉर्ड से दूरी क्यों?

शिकायत में एक और गंभीर आरोप लेन-देन के तरीके को लेकर लगाया गया है।आरोप है कि बड़ी रकम का लेन-देन कथित तौर पर नकद में कराया जाता था और ऑनलाइन भुगतान के विकल्प से बचा जाता था।शिकायतकर्ताओं ने आशंका जताई है कि यदि कैश लेन-देन का आरोप सही पाया जाता है तो हर भुगतान का पारदर्शी डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध न होने से जांच में कई सवाल खड़े हो सकते हैं।हालांकि कैश भुगतान, रसीदों, खातों और वित्तीय रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति अब जांच टीम के दस्तावेजी परीक्षण के बाद ही सामने आएगी।

क्या सरकारी अस्पताल से निजी ब्लड बैंक तक कोई ‘रेफरल चेन’ काम कर रही थी?

इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यही है।संजय गांधी अस्पताल के भीतर मौजूद ब्लड बैंक के बावजूद मरीजों को निजी ब्लड बैंक की ओर भेजे जाने के आरोपों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर यह सिर्फ संयोग था या इसके पीछे कोई सुनियोजित व्यवस्था?क्या डॉक्टर या अस्पताल से जुड़े किसी व्यक्ति द्वारा मरीजों को निजी संस्थान की ओर भेजा जा रहा था?क्या इसके बदले किसी तरह का आर्थिक लाभ लिया जा रहा था?क्या सरकारी ब्लड बैंक की उपलब्धता और निजी ब्लड बैंक की बिक्री के बीच कोई ऐसा नेटवर्क है, जिसकी जांच जरूरी है?इन सवालों के जवाब फिलहाल आरोपों और शिकायतों के स्तर पर हैं। इनकी पुष्टि केवल निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच से ही हो सकेगी।

कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश, अब परीक्षा प्रशासन की भी

कलेक्टर के जांच आदेश के बाद अब निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि जांच कितनी गहराई तक जाती है।क्या सिर्फ निजी ब्लड बैंक के रिकॉर्ड देखे जाएंगे, या फिर यह भी जांच होगी कि—मरीजों को वहां किसने भेजा?सरकारी ब्लड बैंक में उस समय रक्त की वास्तविक उपलब्धता क्या थी?क्रॉस मैचिंग के नाम पर वसूली का नियम क्या है?कितनी राशि ली गई और किस मद में दर्ज की गई?भुगतान कैश में क्यों हुआ?प्रत्येक लेन-देन की वैधानिक रसीद उपलब्ध है या नहीं?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी सरकारी कर्मचारी या निजी व्यक्ति की मिलीभगत थी?जांच का असली मतलब तभी होगा, जब सवालों की जांच भी उतनी ही गंभीरता से हो, जितनी शिकायतों की।

जिंदगी के नाम पर कारोबार का आरोप… अब सच सामने आना चाहिए

खून कोई सामान्य वस्तु नहीं है। यह उस मरीज की सांसों से जुड़ा होता है, जिसके लिए परिवार अस्पताल के गलियारों में उम्मीद लेकर दौड़ रहा होता है।इसीलिए इस मामले में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं और इन्हें केवल बयानबाजी या कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा जा सकता।यदि जांच में अनियमितताएं साबित होती हैं तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।रीवा की जनता अब सिर्फ जांच के आदेश नहीं, जांच का परिणाम देखना चाहती है।सवाल सिर्फ अथर्वन ब्लड बैंक का नहीं है… सवाल यह है कि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने आए मरीज को आखिर निजी दरवाजे तक पहुंचाने वाली व्यवस्था कौन चला रहा था?अब जांच बताएगी कि यह सिर्फ शिकायत थी या फिर जिंदगी और मौत की मजबूरी के बीच चल रहा कोई बड़ा खेल।

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