नई दिल्ली, 11 जून। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि गृहिणियां केवल परिवार की आश्रित नहीं, बल्कि “राष्ट्र निर्माता” (Nation Builders) हैं और उनके घरेलू श्रम का उचित आर्थिक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटना में किसी गृहिणी की मृत्यु होने पर मुआवजा निर्धारित करते समय उसके घरेलू कार्यों और देखभाल संबंधी सेवाओं को भी आर्थिक मूल्य दिया जाएगा।
न्यायमूर्ति Justice Sanjay Karol और Justice N. Kotiswar Singh की पीठ ने यह फैसला वर्ष 2001 में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले में सुनाया। दुर्घटना में एक गृहिणी की मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद परिजनों ने मुआवजे की मांग की थी। मामला विभिन्न न्यायिक चरणों से गुजरते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि गृहिणी का योगदान केवल आर्थिक आय तक सीमित नहीं होता। घर का प्रबंधन, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल और परिवार को भावनात्मक सहयोग प्रदान करना ऐसे कार्य हैं, जिनका समाज और परिवार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। न्यायालय ने कहा कि इन सेवाओं को शून्य मूल्य का नहीं माना जा सकता।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने “Loss of Domestic Care” (घरेलू देखभाल की हानि) को मुआवजा निर्धारण का एक स्वतंत्र आधार माना। अदालत ने कहा कि जिन मामलों में गृहिणी की स्वतंत्र आय सिद्ध नहीं हो, वहां घरेलू देखभाल और सेवाओं के मूल्यांकन के लिए ₹30,000 प्रतिमाह को आधार माना जा सकता है।
न्यायालय ने इस मामले में पहले निर्धारित मुआवजे को अपर्याप्त मानते हुए मृतका के परिवार को देय मुआवजा बढ़ाकर लगभग ₹62.78 लाख कर दिया। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि गृहिणियों के अवैतनिक श्रम को लंबे समय से कम करके आंका जाता रहा है, जबकि उनका योगदान परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय देशभर में लंबित मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा तथा गृहिणियों के घरेलू श्रम को न्यायिक मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा।
एक ओर ग्रहणी राष्ट्र निर्माता तो राजस्थान सरकार ने उन्हीं माताओं क्यों आज तक कोई सहायता एवं जीने के लिए नहीं दी- खबर वन न्यूज

