नई दिल्ली। दिल्ली जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (सेंट्रल) ने एक अहम फैसले में चिकित्सकीय लापरवाही को गंभीर मानते हुए डॉक्टर और नर्सिंग होम को ₹20 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि गलत, लापरवाहीपूर्ण और देरी से किए गए इलाज के कारण एक गर्भवती महिला को स्थायी बांझपन (Permanent Infertility) का सामना करना पड़ा।
आयोग की अध्यक्ष दिव्या ज्योति और सदस्य डॉ. रश्मि की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह मामला केवल इलाज में चूक का नहीं, बल्कि पेशेवर जिम्मेदारी के घोर उल्लंघन का है।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता समरीन ने 24 जुलाई 2020 को फैमिली हेल्थ केयर सेंटर में गर्भावस्था के दौरान इलाज शुरू कराया। उसका उपचार डॉ. कुलजीत कौर गिल द्वारा किया जा रहा था। 11 अगस्त से 2 सितंबर 2020 के बीच महिला को लगातार पेट दर्द और ब्लीडिंग की शिकायत रही, लेकिन इसके बावजूद न तो अल्ट्रासाउंड कराया गया और न ही आवश्यक चिकित्सकीय जांच कराई गई। डॉक्टर ने लक्षणों को सामान्य बताते हुए केवल एसिडिटी और उल्टी की दवाइयाँ दीं।
7 सितंबर 2020 को महिला की हालत गंभीर हो गई, जिसके बाद उसने दूसरे डॉक्टर से परामर्श लिया। जांच में गर्भ में मृत भ्रूण (डेड एम्ब्रियो) पाया गया। उसे तुरंत कस्तूरबा अस्पताल ले जाया गया, जहां आपातकालीन सर्जरी करनी पड़ी और उसकी एक फैलोपियन ट्यूब निकालनी पड़ी। डॉक्टरों ने बताया कि अत्यधिक आंतरिक क्षति के कारण अब वह भविष्य में गर्भधारण नहीं कर सकेगी।
आयोग ने यह भी पाया कि संबंधित डॉक्टर केवल MBBS थीं और उन्होंने स्वयं को विशेषज्ञ स्त्री रोग चिकित्सक के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि उनकी विदेशी डिग्री भारत में मान्यता प्राप्त नहीं थी। इसे आयोग ने पेशेवर गलत प्रस्तुति (Misrepresentation) माना। साथ ही नर्सिंग होम को परोक्स दायित्व (Vicarious Liability) के तहत दोषी ठहराया गया। आयोग ने डॉक्टर और नर्सिंग होम को संयुक्त रूप से ₹20 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।
