
शक्कर, गुड़ और सरसों तेल से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक बढ़ता खर्च; पेट्रोल-डीजल की महंगाई के बाद अब रसोई का बजट भी लड़खड़ाया
रीवा। महंगाई का असली चेहरा किसी सरकारी आंकड़े में नहीं, उस वक्त दिखाई देता है जब महीने के आखिरी दिनों में घर का राशन खत्म होने लगता है और जेब में बचे पैसों का हिसाब लगाना पड़ता है। बाजार में खरीदारी करने पहुंच रहे आम परिवारों की शिकायत है कि सब्जी हो या किराने का सामान, रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें लगातार जेब पर बोझ बढ़ा रही हैं।आलू, प्याज और टमाटर जैसी रोज इस्तेमाल होने वाली सब्जियों के दामों में उतार-चढ़ाव ने रसोई का गणित बिगाड़ रखा है। इसी के साथ शक्कर, गुड़ और सरसों तेल जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतों को लेकर भी उपभोक्ताओं में नाराजगी है। पेट्रोल-डीजल का खर्च पहले से ही घरेलू बजट पर असर डालता रहा है, ऐसे में खाने-पीने की चीजों पर बढ़ता खर्च परिवारों के लिए नई परेशानी बन रहा है।महंगाई को लेकर सरकारी आंकड़ों की तस्वीर भी पूरी तरह नजरअंदाज करने वाली नहीं है। जुलाई 2026 की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक संबंधी आधिकारिक जानकारी 12 अगस्त को जारी की गई थी; महंगाई के आंकड़ों का आकलन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा किया जाता है।
बाजार में सवाल सिर्फ कीमत का नहीं, घर चलाने का है
सब्जी मंडी या किराना दुकान पर ग्राहक जब एक-एक सामान का भाव पूछता है तो सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि छोटी-छोटी खरीदारी भी महीने के बजट को तेजी से खा रही है। पहले जिस रकम में थैला भरकर घर लौट आता था, अब उसी रकम में जरूरी सामान की सूची भी पूरी नहीं हो रही।आम परिवार की परेशानी यही है कि कमाई बढ़ने की रफ्तार चाहे जैसी हो, खर्च का दबाव लगातार महसूस हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई, बिजली, दवा, आने-जाने का खर्च और घर का राशन—हर मोर्चे पर जेब से पैसा निकल रहा है।सरकार महंगाई को नियंत्रित करने के लिए बाजार की निगरानी और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नजर रखने की व्यवस्था का दावा करती है। केंद्र का उपभोक्ता मामलों का विभाग आवश्यक खाद्य वस्तुओं के खुदरा और थोक भाव की निगरानी करता है।
लेकिन आम आदमी के लिए असली सवाल आंकड़ों का नहीं, बाजार में चुकाई जाने वाली कीमत का है।
सरकार से अब राहत की उम्मीद
महंगाई पर राजनीति अपनी जगह है, लेकिन रसोई चलाने वाले परिवार के लिए यह रोज का सवाल है। उसे भाषण नहीं चाहिए, उसे बाजार में राहत चाहिए। उसे यह फर्क नहीं पड़ता कि महंगाई का आंकड़ा कितने प्रतिशत है—उसकी चिंता यह है कि महीने का राशन पहले क्यों खत्म हो रहा है और घरेलू बजट हर महीने क्यों बिगड़ रहा है।यही वजह है कि अब सरकार से सवाल भी सीधा है—यदि महंगाई नियंत्रण में है तो आम परिवार की रसोई में राहत क्यों महसूस नहीं हो रही?सरकार को चाहिए कि आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर प्रभावी निगरानी करे, जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्ती दिखाए तथा उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत देने के लिए ठोस कदम उठाए। क्योंकि महंगाई का सबसे बड़ा आंकड़ा किसी रिपोर्ट में नहीं मिलता—वह उस गृहस्थ की चिंता में दिखाई देता है, जो महीने की तनख्वाह आने से पहले ही अगले महीने के खर्च का हिसाब लगाने बैठ जाता है।
