भाजपा-कांग्रेस ने नहीं खोले पत्ते,नामांकन के आखिरी दौर में सियासी हलचल
जयपुर। राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव का रण शुरू होते ही भाजपा और कांग्रेस के भीतर टिकट वितरण को लेकर घमासान तेज हो गया है। नामांकन प्रक्रिया अंतिम दौर में पहुंच चुकी है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों में कई वार्डों के प्रत्याशियों के नाम अब तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं। टिकट के दावेदार पार्टी कार्यालयों और नेताओं के घरों के चक्कर काट रहे हैं, वहीं टिकट कटने की आशंका वाले दावेदारों ने निर्दलीय मैदान में उतरने की तैयारी भी शुरू कर दी है।
सूची रोकने के पीछे बगावत का डर
भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट से नाराज दावेदारों को संभालना है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों दल एक-दूसरे की रणनीति पर भी नजर रख रहे हैं। भाजपा ने कई जगहों पर प्रत्याशियों की औपचारिक सूची सार्वजनिक करने के बजाय अधिकृत उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह देने की रणनीति पर काम किया है, ताकि टिकट वितरण के बाद होने वाली संभावित बगावत को नियंत्रित किया जा सके।
नामांकन का आखिरी दौर, दावेदारों की धड़कनें तेज
नगरीय निकाय चुनाव के लिए नामांकन 27, 29 और 31 अगस्त को दाखिल किए जा सकते हैं। 1 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 3 सितंबर तक नाम वापस लिए जा सकेंगे। इसके बाद 4 सितंबर को चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। मतदान 9 और 11 सितंबर को होगा तथा मतगणना 14 सितंबर को प्रस्तावित है।
कई जगह टिकट से पहले ही बगावत के संकेत
टिकट वितरण को लेकर असंतोष का असर कुछ क्षेत्रों में सामने भी आने लगा है। माउंट आबू में टिकट वितरण से नाराज कांग्रेस के करीब 20 कार्यकर्ताओं के इस्तीफे की खबर है। वहीं पाली में भाजपा नेता राकेश भाटी के कांग्रेस में शामिल होने की खबर ने चुनावी समीकरणों को और गर्म कर दिया है।
जनता के सामने असली सवाल
निकाय चुनाव में पार्टियां टिकट को लेकर चाहे जितना मंथन करें, अंतिम फैसला जनता के वोट से होगा। वार्ड स्तर पर मतदाता इस बार पार्टी के नाम के साथ-साथ उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, उपलब्धता, काम और क्षेत्र की समस्याओं के प्रति उसकी गंभीरता को भी कसौटी पर कस सकते हैं।
सियासी तस्वीर साफ है—पार्टी का टिकट जीत की गारंटी नहीं और टिकट कटना हार का प्रमाण नहीं। असली मुकाबला अब वार्ड की गलियों में होगा, जहां उम्मीदवार और जनता आमने-सामने होंगे।
