​अजमेर: 15 करोड़ के वित्तीय घपले,निगम अभियंताओं पर सियासी मेहरबानी; भ्रष्टाचार के ‘इनाम’ में प्रमोशन और मलाईदार पद

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अजमेर में भ्रष्टाचार का सिंडिकेट और सिस्टम का संरक्षण

अजमेर: स्मार्ट सिटी और विकास के दावों के बीच अजमेर नगर निगम और संबंधित विभाग दशकों से भ्रष्टाचार के सुरक्षित पनाहगाह बनचुके हैं। निर्माण कार्यों में करोड़ों के वित्तीय घपले, तकनीकीविफलताएं और जांच के आदेश होने के बावजूद जिम्मेदार अभियंताओं पर कार्रवाई के बजाय उन्हें ‘पदोन्नति’ और ‘सियासी संरक्षण’ का तोहफा दिया जा रहा है।

​दैनिक भास्कर में उजागर हुए ताजा मामले के अनुसार, बहुचर्चित ‘रामसेतु’ (एलिवेटेड रोड) परियोजना में करीब 15 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपी तत्कालीन प्रोजेक्ट डायरेक्टर (पीडी) राजेश कुमार शर्मा को अधीक्षण अभियंता (एसई) पद पर पदोन्नत कर अजमेर में ही तैनात कर दिया गया है। यह खेल तब खेला गया जब उनके खिलाफ सीसीए रूल 17 की चार्जशीट लंबित है और एसीबी (ACB) जांच की अनुमति की प्रक्रिया विचाराधीन है।

​भास्कर रिपोर्ट का बड़ा खुलासा: करोड़ों का नुकसान, फिर भी तरक्की

​दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, कलेक्टर स्तर पर गठित जांच कमेटी ने एलिवेटेड रोड प्रोजेक्ट में करोड़ों की बंदरबांट और नियमों की धज्जियां उड़ने की पुष्टि की थी:

  • ठेकेदार को अतिरिक्त भुगतान: जांच रिपोर्ट में तय व्यवस्था से अलग जाकर ठेकेदार को करोड़ों रुपये के अतिरिक्त भुगतान की जिम्मेदारी तय की गई, जिसमें तत्कालीन पीडी राजेश कुमार शर्मा पर 14.97 करोड़ रुपये, हर्ष राय पर 17.82 करोड़ रुपये और अरुण माथुर पर 4.88 करोड़ रुपये की जिम्मेदारी आंकी गई।
  • 20 करोड़ के सरकारी किराए का नुकसान: ठेकेदार ने तोपदड़ा खंड की करीब 7,000 वर्ग मीटर सरकारी जमीन का 5 साल तक व्यावसायिक उपयोग किया, लेकिन उससे 15 से 20 करोड़ रुपये का किराया तक वसूल नहीं किया गया।
  • पेनल्टी नहीं, उल्टे एक्सटेंशन: काम में भारी देरी के बावजूद ठेकेदार पर 22 करोड़ रुपये की पेनल्टी लगाने या काम निरस्त करने के बजाय समय-वृद्धि (Time Extension) देकर अतिरिक्त भुगतान किए गए।
  • 1993 के डीओपी (DOP) नियमों की अनदेखी: राज्य सरकार के कार्मिक विभाग के 26 नवंबर 1993 के स्पष्ट आदेश हैं कि जिन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच या कोर्ट केस लंबित हो, उनका प्रमोशन लिफाफा सीलबंद रखा जाए। इसके बावजूद नियमों को दरकिनार कर पदोन्नति दे दी गई।

​भ्रष्टाचार का अजमेर मॉडल: निगम के ‘शर्मा’ राज से जयपुर तक का ‘नेक्सस’

​अजमेर में यह खेल केवल एलिवेटेड रोड तक सीमित नहीं है। नगर निगम और स्वायत्तशासी निकायों में यह दशकों पुराना ढर्रा बन चुका है:

  • फाइलें दबाने के लिए ‘चहेतों’ की तैनाती: पूर्व में भी निगम के एक उच्चाधिकारी (शर्मा) के कार्यकाल के दौरान अपने पसंदीदा कनिष्ठ अभियंताओं को नियमों को ताक पर रखकर अधिशाषी अभियंता (XEN) बनाकर बैठाया गया। आरोप हैं कि यह पूरी बिसात इसलिए बिछाई गई ताकि टेंडरों में हुई वित्तीय गड़बड़ियों, विधायक फंड के विवादित भुगतानों और कमीशनखोरी की अंदरूनी फाइलों को दबाया जा सके।
  • राजनीतिक संरक्षण की ढाल: कई अभियंताओं के खिलाफ नोटिस जारी हुए, जांच कमेटियों ने गड़बड़ियां पकड़ीं और आयोग स्तर पर दस्तावेज सत्यापित हुए, लेकिन राजनीतिक आकाओं के संरक्षण के चलते जांच कभी अंजाम तक नहीं पहुंची।
  • जयपुर तक सुरक्षित पोस्टिंग: दागी अभियंताओं पर शिकंजा कसने के बजाय उन्हें राजनीतिक रसूख के दम पर प्रमोट करवाकर जयपुर और अन्य अहम जगहों पर मलाईदार कुर्सियां दिलवाई गईं, जहां वे बेखौफ होकर प्रशासनिक सिस्टम का मजाक बना रहे हैं।

​जनता के हिस्से बदहाली: पहली बारिश में खुली गुणवत्ता की पोल

​करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अजमेर की जनता को जो विकास मिला, उसकी हकीकत शहर की सड़कों पर दिखती है:

  • ​जुलाई 2025 में भारी बारिश के दौरान एलिवेटेड रोड की महाबोधि सर्किल वाली भुजा धंस गई थी, जिसे मरम्मत के लिए करीब 6 महीने तक बंद रखना पड़ा। इस भुजा का निर्माण और भुगतान भी तत्कालीन पीडी के कार्यकाल में ही हुआ था, जिसकी जांच एमएनआईटी (MNIT) जयपुर की तकनीकी टीम तक को करनी पड़ी।
  • ​विधायक फंड से लेकर स्मार्ट सिटी और निगम के करोड़ों के बजट की बंदरबांट का सीधा असर शहर की बदहाल सड़कों, खस्ताहाल ड्रेनेज और अधूरे प्रोजेक्ट्स के रूप में जनता भुगत रही है।

​अधिकारियों के विरोधाभासी बोल

  • राजेश कुमार शर्मा (एसई, पीडब्ल्यूडी अजमेर): “मैंने कलेक्टर की चार्जशीट का जवाब दे दिया है। मामला कोर्ट में है। मुझे नियमों की ज्यादा जानकारी नहीं है। प्रमोशन हेड ऑफिस डिपार्टमेंट करता है।”
  • लोक बंधु (कलेक्टर एवं सीईओ, स्मार्ट सिटी अजमेर): “पीडी को चार्जशीट जारी की थी। कोर्ट केस के कारण पेंडिंग है। चार्जशीट पेंडिंग रहते प्रमोशन नहीं हो सकता।”

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बड़ा सवाल: जब जिला कलेक्टर स्वयं कह रहे हैं कि चार्जशीट पेंडिंग रहते प्रमोशन नहीं हो सकता, तो फिर किसके राजनीतिक दबाव और इशारे पर दागी अभियंताओं को पदोन्नति का ‘तोहफा’ देकर अजमेर की बदहाली पर पर्दा डाला जा रहा है?

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