अजमेर की जनता अब टिकट नहीं, अपना प्रतिनिधि चुने—वरना लोकतंत्र की चाबी पार्टी कार्यालयों में ही घूमती रहेगी –
अजमेर। अजमेर नगर निगम के 80 वार्डों की आरक्षण लॉटरी ने सिर्फ वार्डों के रंग नहीं बदले हैं, इसने शहर की राजनीति के सामने एक ऐसा आईना भी रख दिया है, जिसमें नेताओं से ज्यादा अब जनता का चेहरा दिखाई देना चाहिए। आरक्षण आया है। कुछ वार्ड OBC हुए, कुछ SC, एक ST और कुछ महिला आरक्षण की श्रेणी में चले गए। राजनीतिक दलों में टिकट की दौड़ शुरू होगी। बायोडाटा निकलेंगे। सिफारिशें चलेंगी। रिश्तेदारियां याद आएंगी। पुराने राजनीतिक समीकरण जागेंगे और कुछ घरों में शायद यह चर्चा भी शुरू हो गई होगी—“वार्ड हमारा है, टिकट किसका होगा?”
अजमेर की जनता को एक छोटा-सा सवाल पूछना चाहिए—“वार्ड आपका है या जनता का?” यह सवाल चुनाव की असली परीक्षा । आरक्षण का उद्देश्य उन वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना है, जिन्हें लंबे समय तक पर्याप्त अवसर नहीं मिला। लेकिन जमीन पर चिंता यह है कि आरक्षित सीट का टिकट उसी व्यक्ति तक सीमित न रह जाए, जिसके पास पहले से पैसा, संपत्ति, राजनीतिक पहुंच और प्रभाव मौजूद है।आरक्षण अगर केवल टिकट का रंग बदल दे और उम्मीदवार का सामाजिक-आर्थिक चेहरा वही पुराना रहे, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिला?
आरक्षित वार्ड में ‘आरक्षित’ कौन?
जनता को तय करना होगा, क्या आरक्षित वार्ड में वही व्यक्ति उम्मीदवार बने, जो पहले से आर्थिक रूप से मजबूत है, संपत्तियों का मालिक है, वर्षों से राजनीति में प्रभावशाली है और पार्टी के बड़े नेताओं तक उसकी पहुंच है? या वह व्यक्ति आगे आए जो उसी वार्ड की गली में रहता है, लोगों के सुख-दुख में खड़ा होता है, पानी की समस्या पर नगर निगम जाता है, नाली के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाता है, सड़क टूटने पर आवाज उठाता है और चुनाव खत्म होने के बाद भी जनता के बीच दिखाई देता है?यहीं आरक्षण की असली परीक्षा है।क्योंकि आरक्षण का मतलब केवल यह नहीं कि उम्मीदवार किसी आरक्षित वर्ग से आता हो।
आरक्षण की आत्मा यह है कि अवसर उस व्यक्ति तक भी पहुंचे, जिसके पास सत्ता के दरवाजे पर दस्तक देने के लिए न पैसा है, न राजनीतिक परिवार की विरासत।
पार्टियों से टिकट नहीं मिला तो क्या जनता भी हार जाएगी।
यहां एक और कड़वा सवाल है। अगर किसी वार्ड में आरक्षण लागू है और उस वर्ग का कोई जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता वर्षों से जनता के बीच काम कर रहा है, लेकिन राजनीतिक दल उसे टिकट नहीं देता—तो क्या उसका राजनीतिक सफर वहीं खत्म हो जाना चाहिए?नहीं। लोकतंत्र में पार्टी महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता उससे भी बड़ी है।अगर आरक्षित वर्ग का वास्तविक जमीनी कार्यकर्ता पार्टी टिकट के बिना चुनाव लड़ने का साहस करता है और जनता उसे स्वीकार करती है, तो यह सिर्फ एक निर्दलीय उम्मीदवार की जीत नहीं होगी। बल्कि यह संदेश होगा—“टिकट पार्टी ने नहीं दिया, लेकिन टिकट जनता ने दे दिया।”
‘पति पार्षद’ के बाद अब ‘जनता का पार्षद’?
महिला आरक्षण के बाद एक और सवाल जनता को पूछना चाहिए। क्या महिला आरक्षण का अर्थ वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व देना है? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि उम्मीदवार महिला हो और फैसले किसी और के?
नाम महिला का, कुर्सी महिला की और नियंत्रण किसी और का—क्या यही महिला राजनीतिक सशक्तिकरण है?
अजमेर की जनता को इस बार ऐसे प्रतिनिधि की जरूरत है जो खुद निर्णय ले सके, खुद जनता के बीच जा सके और खुद अधिकारियों से सवाल कर सके। वार्ड को ‘पति पार्षद’ या ‘परिवार पार्षद’ नहीं, अपना पार्षद चाहिए।
यह कटाक्ष किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रवृत्ति पर है जिसमें लोकतांत्रिक पद कभी-कभी परिवार की राजनीतिक संपत्ति जैसा दिखाई देने लगता है।
अब जनता को भी चुनाव लड़ना चाहिए—कम से कम सवालों के साथ! हर नागरिक चुनाव नहीं लड़ सकता। लेकिन हर नागरिक सवाल तो पूछ सकता है।
उम्मीदवार से पूछा जाए—आपका वार्ड में स्थायी जुड़ाव कितना है?पिछले पांच साल में आपने जनता के लिए क्या किया?आपके पास वार्ड विकास की योजना क्या है?
आप पार्टी से टिकट क्यों चाहते हैं—जनता के लिए या राजनीति के लिए? अगर पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो क्या आप फिर भी जनता के बीच रहेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—“आप जीतने के बाद पांच साल में कितनी बार हमारे वार्ड में दिखाई देंगे?”
यह सवाल पूछते ही चुनाव का असली चेहरा सामने आ जाएगा। नेता पार्टी के गुलाम हैं या जनता के सेवक?
आज राजनीति में एक विचित्र दृश्य दिखाई देता है। नेता जनता से वोट मांगता है, लेकिन कई बार उसकी राजनीतिक प्राथमिकता जनता से ज्यादा पार्टी लाइन बन जाती है।
पार्टी बोलेगी तो हाथ उठेगा। पार्टी बोलेगी तो आवाज उठेगी। पार्टी कहेगी तो विरोध होगा और पार्टी कहेगी तो समर्थन। लेकिन नगर निगम का पार्षद सबसे पहले किसके प्रति जवाबदेह होना चाहिए? पार्टी के प्रति या अपने वार्ड के मतदाताओं के प्रति? यही सवाल अजमेर की जनता को इस चुनाव में पूछना चाहिए। जिस दिन जनता ने अपने प्रतिनिधि को यह समझा दिया कि “तुम्हारी असली पार्टी हमारा वार्ड है।” उस दिन राजनीति का समीकरण बदल जाएगा। जिस दिन जनता अपना पार्षद खुद चुनेगी…उस दिन पार्टियां उम्मीदवार नहीं थोप पाएंगी। पार्टियों को जनता के पसंदीदा उम्मीदवार के पास जाना पड़ेगा। तब टिकट पाने वाला नेता जनता से नहीं कहेगा—
“मुझे पार्टी ने टिकट दिया है।” बल्कि पार्टी को कहना पड़ेगा—“जिसे जनता चाहती है, उसे टिकट दो।”
यही लोकतंत्र का असली उलटफेर होगा। आज कई जगह राजनीतिक कार्यकर्ता टिकट के लिए नेताओं के दरवाजे पर खड़े होते हैं। कल्पना कीजिए उस दिन की, जब पार्टी के नेता किसी सामान्य गली के कार्यकर्ता के दरवाजे पर जाकर कहें—
“आप चुनाव लड़िए, जनता आपको चाहती है।”
यह सपना असंभव नहीं है। बस जनता को अपना अधिकार पहचानना होगा।आरक्षित वर्ग के भीतर भी आर्थिक और सामाजिक रूप से अनेक स्तर हैं। इसलिए यह जरूरी है कि आरक्षण का राजनीतिक लाभ केवल पहले से प्रभावशाली वर्ग तक सीमित न रह जाए।
जिसे सबसे ज्यादा जरूरत है, उसकी आवाज सबसे पहले सुनी जाए। और अगर राजनीतिक दल उस आवाज को टिकट देने से रोकते हैं, तो संविधान ने जनता को एक और रास्ता दिया है—
निर्दलीय उम्मीदवार।
निर्दलीय होना कमजोरी नहीं है।अगर उसके पीछे जनता है तो वही सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन है। अब फैसला अजमेर की गलियों में होगा । इस बार अजमेर की गली, मोहल्ला, बाजार और बस्ती को राजनीतिक प्रयोगशाला बनना चाहिए।
हर वार्ड में लोग बैठें।अपने बीच से पांच अच्छे नाम निकालें।
उनसे सवाल करें। उनका काम देखें। फिर तय करें कि किसे नगर निगम भेजना है। किसी पार्टी के झंडे से पहले वार्ड का झंडा देखिए। किसी बड़े नेता के चेहरे से पहले अपने मोहल्ले का चेहरा देखिए। किसी करोड़पति उम्मीदवार की चमक से पहले उस व्यक्ति की ईमानदारी देखिए, जो आपके घर के सामने की टूटी सड़क के लिए नगर निगम में दस बार गया हो।
क्योंकि पार्षद का काम विधानसभा में भाषण देना नहीं है।
पार्षद का पहला काम अपने वार्ड की गली को जानना है।
और अंत में… एक सवाल अजमेर से आरक्षण ने वार्ड तय कर दिए। अब प्रतिनिधि जनता तय करेगी या राजनीतिक दल? अगर जनता ने यह फैसला भी दूसरों के हाथ में छोड़ दिया, तो फिर पांच साल तक शिकायत करने का अधिकार भी कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन अगर इस बार अजमेर की जनता ने कहा—“उम्मीदवार कोई भी हो, फैसला हमारा होगा।”
तो यह सिर्फ नगर निगम चुनाव नहीं रहेगा। यह अजमेर की राजनीति में जनता की वापसी होगी। आरक्षित वर्ग के उस जमीनी कार्यकर्ता के लिए भी यह मौका है, जिसे शायद पार्टी कार्यालय में टिकट न मिले। सामान्य वर्ग के उस नागरिक के लिए भी यह मौका है, जो वर्षों से राजनीति को सिर्फ नेताओं की जागीर समझता आया है। महिला के लिए भी यह मौका है कि वह किसी की राजनीतिक प्रतिनिधि नहीं, अपनी वार्ड की निर्वाचित आवाज बने। और हर मतदाता के लिए यह मौका है कि वह पांच साल के लिए किसी नेता का समर्थक नहीं, बल्कि
अपने चुने हुए पार्षद का मालिकाना सवाल पूछने वाला नागरिक बने। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा टिकट पार्टी नहीं देती—जनता देती है।
और इस बार अजमेर की जनता अगर सच में जाग गई, तो हो सकता है अगली नगर निगम की सबसे बड़ी खबर यह न हो कि किसे टिकट मिला…बल्कि यह हो—
