​भयनाशिनी माँ कालरात्रि: नवरात्रि के सातवें दिन की संपूर्ण पूजा-अर्चना

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!! माँ कालरात्रि !!
!! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम: !!

नवरात्रि के दौरान देवी कालरात्रि की पूजा का सातवां दिन

नाम— कालरात्रि
मनपसंद फूल — रात की रानी
अर्थ — काल का नाश करने वाली

माँ दुर्गा का सातवां कालरात्रि का यह रूप सबसे क्रूर और भयंकर माना जाता हैं। मान्यता है कि इनके नाम से सारी आसुरी शक्तियां थर – थर कांपती हैं। अत्यंत विकराल रूप होने के बावजूद, वह अपने भक्तों को हमेशा शुभ फल और निर्भयता प्रदान करती हैं, इसलिए उन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। इस अवतार में देवी अपने श्रद्धालुओं को सभी बुराई से बचाती है और खुशियां देती हैं। मां कालरात्रि का शाब्दिक अर्थ “काल (समय या मृत्यु) की रात्रि” या “अंधकार (अज्ञान) का नाश करने वाली” होता है। इस दिन श्रद्धालुगण नीला वस्त्र पहनते है और देवी को गुड़ का भोग चढ़ाते हैं।

मंत्र—
ॐ देवी कालरात्र्यै नम:।

महामंत्र—
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गति नाशिन्यै महामायायै स्वाहा।

स्तुति—
ॐ या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

प्रार्थना—
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

ध्यान—
करालावन्दना घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिम् करालिंका दिव्याम् विद्युतमाला विभूषिताम्॥
दिव्यम् लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयम् वरदाम् चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम्॥
महामेघ प्रभाम् श्यामाम् तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवम् सचियन्तयेत् कालरात्रिम् सर्वकाम् समृद्धिदाम॥

स्तोत्र—
ह्रीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पघ्नी कमदीश कृपान्विता॥
कामबीजजपानन्दा कामबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनाऽऽर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्रवर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कवच—
ॐ क्लीं में हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी ॥
रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णो शंकर भामिनी ॥
वर्जितानि तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवी, सततम् पातु स्तम्भिनी ॥

आरती—
कालरात्रि जय-जय-महाकाली। काल के मुँह से बचाने वाली॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा। महाचंडी तेरा अवतारा॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥
खड्ग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब जगह देखूं तेरा नजारा॥
सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥
रक्तदन्ता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥
ना कोई चिंता रहे बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥
उस पर कभी कष्ट ना आवें। महाकाली मां जिसे बचावे॥
तू भी भक्त प्रेम से कह। कालरात्रि मां तेरी जय॥

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