13 साल जेल में रहने के बाद हत्या के आरोपी को हाईकोर्ट से बरी

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उम्रकैद का फैसला पलटा, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी पूरी तरह साबित नहीं कर पाया अभियोजन

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने हत्या के मामले में करीब 13 वर्षों से जेल में बंद रामभरोस साहनी को बड़ी राहत देते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निरस्त करते हुए आपराधिक अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने निर्देश दिए कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

मामला वर्ष 2013 का है। 18 जून 2013 को जयपुर के नाहरगढ़ रोड थाना क्षेत्र में एक महिला का शव उसके किराए के कमरे से बरामद हुआ था। महिला के गले पर चाकू से चोट के निशान पाए गए थे। घटना के बाद उसका पति रामभरोस साहनी मौके पर नहीं मिला। इसके आधार पर उसके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया और जांच के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आरोप-पत्र न्यायालय में पेश किया गया।

पुलिस ने आरोपी को 25 जून 2013 को गिरफ्तार किया। मुकदमे के दौरान अभियोजन ने 12 गवाह पेश किए और 42 दस्तावेज अदालत में प्रदर्शित किए। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 26 अप्रैल 2017 को रामभरोस साहनी को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

इस फैसले के खिलाफ आरोपी की ओर से अधिवक्ता हरि किशन सैनी ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक अपील पेश की। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति महेंद्र कुमार गोयल और न्यायमूर्ति संदीप तनेजा की खंडपीठ ने की। खंडपीठ ने 23 सितंबर 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

प्रत्यक्षदर्शी नहीं, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका था मामला

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और हत्या की घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी सामने नहीं आया। अदालत के अनुसार अभियोजन आरोपी और मृतका के बीच घटना से पहले अंतिम बार साथ देखे जाने की परिस्थिति को विश्वसनीय तरीके से साबित नहीं कर सका।

अदालत ने कथित चाकू और खून लगे कपड़ों की बरामदगी को लेकर भी गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास पाए। न्यायालय ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामले में अभियोजन को ऐसी पूरी और मजबूत कड़ी स्थापित करनी होती है, जिससे आरोपी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के दोषी होने की संभावना न रह जाए।

केवल घटना के बाद गायब रहना पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घटना के बाद आरोपी का कुछ समय तक मौके से अनुपस्थित रहना अपने आप में हत्या का दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जब परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला ही संदेह से परे साबित नहीं हो पाती, तो केवल आरोपी के आचरण के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

खंडपीठ ने माना कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ ऐसी परिस्थितियों की पूर्ण श्रृंखला स्थापित करने में असफल रहा, जिससे केवल उसी के दोषी होने का निष्कर्ष निकले। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 26 अप्रैल 2017 के दोषसिद्धि और सजा संबंधी निर्णय को निरस्त कर दिया तथा रामभरोस साहनी को हत्या के आरोप से बरी कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि यदि वह किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। इस तरह 25 जून 2013 से जेल में बंद रामभरोस साहनी को करीब 13 वर्ष बाद हाईकोर्ट के फैसले से बड़ी कानूनी राहत मिली।

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