राजस्थान सरकार के स्कूलों में फोटो-वीडियोग्राफी को लेकर नए आदेश पर सवाल — निजता की आड़ में जनहित की खबरों को सरकार रोकना क्यों चाह रही ?
जयपुर। राजस्थान के शिक्षा विभाग की ओर से 16 अगस्त 2026 को जारी निर्देशों ने स्कूल परिसरों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश तथा विद्यार्थियों और विद्यालय की गतिविधियों की फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर परिपत्र जारी किया । आदेश में प्रधानाचार्य की पूर्व लिखित अनुमति लेनी होगी ।
सवाल यह है कि सुरक्षा और बच्चों की निजता की रक्षा जरूरी है, लेकिन क्या उसी व्यवस्था के नाम पर जनहित में मौके पर पहुंचकर सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकारों की स्वतंत्रता भी अनुमति की चौखट पर खड़ी कर दी जाएगी?
सरकार से पहला सवाल—घटना घट रही हो तो पत्रकार पहले अनुमति मांगे या खबर करे?
कल्पना कीजिए किसी सरकारी स्कूल में भवन की छत गिरने की स्थिति बनती है, बच्चों के लिए पेयजल की समस्या है, मिड-डे मील में अनियमितता का आरोप है, स्कूल में मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं या किसी सरकारी योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठते हैं।
ऐसी स्थिति में पत्रकार मौके पर पहुंचता है।
क्या वह कैमरा निकालने से पहले प्रधानाचार्य के पास लिखित अनुमति लेने जाएगा?
और यदि अनुमति नहीं मिली तो? क्या घटना की तस्वीर जनता तक नहीं पहुंचेगी? क्या सरकारी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति केवल सरकारी प्रेस नोट देखकर ही जनता जानेगी?
जिम्मेदार कौन ? यह भी पढ़ें :-


जनता के टैक्स से चलने वाले संस्थानों में जनता की निगरानी का अधिकार कितना रहेगा?
सरकारी स्कूल किसी निजी संस्था की संपत्ति नहीं हैं। वहां शिक्षक, अधिकारी, भवन, योजनाएं और संसाधन सार्वजनिक धन से संचालित होते हैं।
इसलिए सरकार से यह सवाल पूछा जाना चाहिए—
अगर जनता टैक्स देती है, सरकार जनता के पैसे से स्कूल चलाती है, तो जनता के प्रतिनिधि के रूप में काम करने वाली पत्रकारिता को हर तस्वीर के लिए उसी व्यवस्था से अनुमति क्यों लेनी चाहिए जिसकी जांच या निगरानी खबर का विषय हो सकती है?
यह सवाल किसी पत्रकार को मनमानी करने का अधिकार देने का नहीं है।
यह सवाल है जनहित में स्वतंत्र निगरानी और पारदर्शिता का।
निजता जरूरी है, लेकिन ‘जनहित’ उससे अलग है
बच्चों की पहचान, निजी जानकारी और संवेदनशील परिस्थितियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पत्रकारिता के मानदंड भी जिम्मेदार रिपोर्टिंग, सत्यापन और निजता के सम्मान की बात करते हैं।
लेकिन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता मानदंड यह भी स्पष्ट करते हैं कि निजता और जनहित एक ही चीज नहीं हैं। सार्वजनिक पद पर कार्यरत व्यक्तियों के ऐसे आचरण का प्रश्न, जो सार्वजनिक हित से जुड़ा हो, प्रेस की रिपोर्टिंग के दायरे में आ सकता है; साथ ही प्रेस से निष्पक्षता, सत्यापन और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।
तो फिर सवाल यह है—
क्या किसी बच्चे का चेहरा दिखाना और किसी सरकारी स्कूल की टूटी छत दिखाना एक ही श्रेणी में रखा जा सकता है?
क्या किसी विद्यार्थी की निजी जानकारी सार्वजनिक करना और सरकारी स्कूल में खराब व्यवस्था की तस्वीर जनता को दिखाना समान है?
नहीं।
यही वह अंतर है जिसे किसी भी नियम को लागू करते समय स्पष्ट रखना होगा।
पत्रकार सरकार का विरोधी नहीं—जनता की आंख है
पत्रकार का काम सरकार को बदनाम करना नहीं है।
पत्रकार का काम सरकार की अच्छी योजनाओं को जनता तक पहुंचाना भी है और जहां व्यवस्था में कमी हो, वहां सवाल पूछना भी है।
अगर स्कूल में सब कुछ अच्छा है तो कैमरा सरकार की उपलब्धि दिखाएगा।
अगर स्कूल में कमी है तो वही कैमरा जनता की समस्या दिखाएगा।
फिर कैमरे से डर किसे होना चाहिए—सच्चाई को या व्यवस्था की कमी को?
आने वाले चुनावों में जनता भी सवाल पूछेगी
लोकतंत्र में सरकारें स्थायी नहीं होतीं।
आज सत्ता में कोई है, कल कोई और होगा।
लेकिन जनता और पत्रकारिता दोनों लोकतंत्र के स्थायी प्रहरी हैं।
इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि इन निर्देशों का उद्देश्य वास्तव में बच्चों की सुरक्षा और निजता सुनिश्चित करना है या सरकारी संस्थानों की मीडिया निगरानी को अनुमति-आधारित बनाना?
अगर उद्देश्य सुरक्षा है तो पत्रकारों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और गैर-मनमाना प्रोटोकॉल क्यों नहीं बनाया जाता?
अगर उद्देश्य निजता है तो सार्वजनिक हित की खबरों के लिए स्पष्ट अपवाद क्यों नहीं?
अगर उद्देश्य अनुशासन है तो क्या अनुमति देने या रोकने की शक्ति के साथ जवाबदेही की व्यवस्था भी होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
यदि किसी सरकारी स्कूल में उसी समय कोई गंभीर घटना घट रही हो, तो क्या पत्रकार पहले अनुमति मांगेगा या जनता को सच दिखाएगा?
सरकार से आखिरी सवाल
सरकार को यह तय करना होगा कि वह निजता की रक्षा कर रही है या पारदर्शिता की सीमा तय कर रही है।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले कैमरे को केवल अनुमति की दीवार के पीछे खड़ा कर देना आसान है, लेकिन उस दीवार के बाहर खड़ी जनता के सवालों का जवाब देना इतना आसान नहीं होगा।
आज पत्रकार से अनुमति मांगी जा रही है—कल जनता से सवाल पूछने की अनुमति तो नहीं मांगी जाएगी?
सरकार को याद रखना होगा—
प्रेस की जिम्मेदारी है सच दिखाना,
सरकार की जिम्मेदारी है सच का सामना करना।
और यदि नियमों का इस्तेमाल जनहित की पत्रकारिता को रोकने के लिए हुआ, तो आने वाले चुनावों में यह केवल पत्रकारों का नहीं, जनता के सामने सरकार का भी सवाल होगा।
जनता पूछेगी—
जिस लोकतंत्र में सरकार जनता से वोट मांगती है, उसी लोकतंत्र में जनता की आंख और कान बने मीडिया को सच दिखाने से पहले अनुमति क्यों ?
