नईदिल्ली/ डिंडीगुल (तमिलनाडु)। (एजेंसी) सदियों से अपनी मजबूती और विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध डिंडीगुल के पारंपरिक ताले एक बार फिर चर्चा में हैं। कभी देश के प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों और संस्थानों की सुरक्षा का भरोसेमंद प्रतीक रहे डिंडीगुल के ताला उद्योग को वर्षों की गिरावट के बाद अब नई पहचान मिल रही है।
डिंडीगुल के ताले केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों की पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। समय के साथ आधुनिक लॉकिंग सिस्टम और बड़े पैमाने पर मशीन निर्मित तालों के बढ़ते उपयोग से इस पारंपरिक उद्योग पर संकट गहराने लगा था। कई कारीगरों ने यह पेशा छोड़ दिया, जिससे इस ऐतिहासिक कला के अस्तित्व पर भी सवाल खड़े होने लगे।
वर्ष 2019 में डिंडीगुल के तालों को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग मिलने के बाद इस उद्योग को नई पहचान मिली। GI टैग ने न केवल डिंडीगुल के तालों की विशिष्टता को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई, बल्कि स्थानीय कारीगरों के उत्पादों को बाजार में अलग पहचान भी प्रदान की।
केंद्र सरकार द्वारा GI उत्पादों के प्रचार-प्रसार, स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन और पारंपरिक शिल्प के संरक्षण की विभिन्न पहलों से डिंडीगुल के ताला उद्योग को भी लाभ मिला है। इसके चलते स्थानीय कारीगरों में नई उम्मीद जगी है और कई परिवार फिर से इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग के साथ-साथ बेहतर विपणन, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंच और सरकारी प्रोत्साहन ने इस पारंपरिक उद्योग को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज डिंडीगुल की कार्यशालाओं में एक बार फिर हथौड़ों की आवाज सुनाई दे रही है, जो इस ऐतिहासिक शिल्प के पुनर्जागरण का संकेत मानी जा रही है।
