अजमेर में गंगा जल संरक्षण या राजनीतिक फोटोशूट?

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श्मशान में झाड़ू, शहर में प्यास और कैमरों के सामने जल संरक्षण का मजाक

विशेष टिप्पणी | अजमेर

कभी-कभी राजनीति ऐसे दृश्य रच देती है कि व्यंग्य भी शर्मिंदा हो जाए। अजमेर में गंगा जल संरक्षण अभियान के नाम पर जो तस्वीर सामने आई, वह कुछ ऐसी ही कहानी बयां करती है।

देश के प्रधानमंत्री जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की बात करते हैं। उनका संदेश स्पष्ट है—जल स्रोत बचाओ, पानी बचाओ, भविष्य बचाओ। लेकिन अजमेर भाजपा के जिला नेतृत्व ने शायद इस संदेश का नया अर्थ खोज लिया है। यहां जल संरक्षण का अभियान तालाबों, बावड़ियों, जलाशयों और वर्षा जल संग्रहण स्थलों पर नहीं, बल्कि श्मशान घाट में झाड़ू लगाकर चलाया गया।

प्रश्न यह नहीं है कि श्मशान की सफाई क्यों की गई। सफाई तो हर सार्वजनिक स्थल की होनी चाहिए। प्रश्न यह है कि गंगा जल संरक्षण अभियान और श्मशान में झाड़ू लगाने का संबंध आखिर क्या है?

यदि जल संरक्षण का संदेश देना था तो शहर के सूखते जल स्रोतों पर जाया जाता। यदि प्रधानमंत्री की योजना को सफल बनाना था तो वर्षा जल संचयन के मॉडल तैयार किए जाते। यदि जनता को जागरूक करना था तो पानी बचाने के उपाय बताए जाते। लेकिन यहां तो पूरा आयोजन कैमरे, फोटो और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित दिखाई दिया

सौजन्य: से सभी फोटो सोशल मीडिया चैनल बात आज की से

विडंबना देखिए, जिस अजमेर में हर गर्मी के मौसम में पानी को लेकर हाहाकार मचता है, जहां कई क्षेत्रों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान रहते हैं, जहां जल संकट वर्षों से एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है, वहां भाजपा नेतृत्व को जल संरक्षण का सबसे बड़ा प्रतीक श्मशान घाट नजर आया।

यह वही अजमेर है जहां स्मार्ट सिटी के सपनों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन शहर आज भी धूल, टूटी सड़कों, अधूरे प्रोजेक्टों और अव्यवस्थाओं की मिसाल बना हुआ है। चौपाटी, पाथवे और विकास के कई दावे जनता की अदालत में पहले से कठघरे में खड़े हैं। ऐसे में गंगा जल संरक्षण जैसे गंभीर अभियान का भी फोटो सेशन में बदल जाना चिंता का विषय है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि इससे प्रधानमंत्री के मूल संदेश की गंभीरता कमजोर होती है। जब राष्ट्रीय महत्व की योजनाओं को स्थानीय स्तर पर केवल दिखावे का माध्यम बना दिया जाता है, तब नुकसान किसी पार्टी का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का होता है।

जनता अब यह पूछ रही है कि क्या भाजपा संगठन के पास वास्तव में जल संरक्षण का कोई रोडमैप है, या फिर अभियान का उद्देश्य केवल तस्वीरें बनाना था?

राजनीति में प्रतीक महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन जब प्रतीक वास्तविकता का स्थान ले लेते हैं, तब वे उपहास का कारण बन जाते हैं। अजमेर में गंगा जल संरक्षण अभियान का यही हश्र दिखाई दिया।

शहर प्यासा है,
तालाब दम तोड़ रहे हैं,
जल स्रोत उपेक्षित हैं,
जनता पानी के लिए परेशान है।

लेकिन सत्ता के स्थानीय सिपहसालार श्मशान में झाड़ू लगाकर जल संरक्षण का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं।

लगता है अजमेर में अब विकास का नया मॉडल तैयार हो चुका है—

“जहां समस्या हो वहां मत जाओ, जहां कैमरा हो वहीं पहुंच जाओ।”

यदि यही सोच रही तो आने वाले समय में जनता भी अपना फैसला उसी स्पष्टता से सुनाएगी, जिस स्पष्टता से वह आज सवाल पूछ रही है।

और सबसे बड़ा सवाल यही है—

प्रधानमंत्री जल संरक्षण बचा रहे हैं या अजमेर भाजपा उसकी छवि डुबो रही है?

क्योंकि जिस दिन जनता को यह लगने लगे कि योजनाएं जमीन पर नहीं, केवल तस्वीरों में चल रही हैं, उसी दिन किसी भी संगठन का सिर झुकना शुरू हो जाता है।

अजमेर आज यही संदेश दे रहा है—
जल संरक्षण का अभियान नहीं, राजनीतिक प्रदर्शन का आयोजन हुआ है।
– देवेंद्र सक्सैना

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