आस्था या अतिक्रमण? प्रशासन की चुप्पी से सड़कों पर बढ़ता टकराव

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निगम – प्रशासन चुप , जनता लाचार आस्था की आड़ में सुविधा,व्यापार का अतिक्रमण


अजमेर। शहर की सड़कों पर आज जो टकराव दिखाई दे रहा है, वह अचानक पैदा नहीं हुआ। यह वर्षों से चली आ रही नगर निगम, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और लापरवाही का परिणाम है। सवाल यह नहीं है कि पहले क्या बना—मंदिर या पेशाबघर। असली सवाल यह है कि जब यह सब बन रहा था, तब जिम्मेदार लोग कहां थे?

यदि यहां पहले पेशाबघर था, तो उसके पास मंदिर किसने और किसकी अनुमति से बनवाया? और अगर मंदिर पहले था, तो फिर वहां सार्वजनिक सुविधा का निर्माण कैसे हुआ? यह विरोधाभास बताता है कि नियमों की खुलेआम अनदेखी हुई, और उस समय ना प्रशासन जागा, ना ही स्थानीय जिम्मेदारों ने कोई आपत्ति उठाई।

आज व्यापारी सवाल उठा रहे हैं, जनता बहस कर रही है, और सोशल मीडिया पर सच-झूठ की लड़ाई चल रही है। लेकिन यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि जब अवैध निर्माण हो रहे थे, तब सब चुप थे। यही चुप्पी अब विवाद और उन्माद में बदल रही है।

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अजमेर के कई इलाके इसका उदाहरण बन चुके हैं—चौरसियावास रोड, रीजनल कॉलेज चौराहा, बजरंगगढ़, गंज चौराहा, क्रिश्चियन गंज—जहां धीरे-धीरे आस्था के नाम पर अतिक्रमण बढ़ता गया। छोटी-सी मूर्ति से शुरू होकर बड़े मंदिर, फिर दुकानों का जमावड़ा और अंततः सड़क तक कब्जा। नतीजा—ट्रैफिक जाम, अव्यवस्था और आम जनता की परेशानी

विडंबना देखिए, जहां आम नागरिक को वाहन खड़ा करने के लिए शुल्क देना पड़ता है, वहीं सड़कों के बीच दुकानें सजती हैं, गन्ने का रस बिकता है, फूल-माला और तेल की दुकानें खुलती हैं—और यह सब “आस्था” के नाम पर वैध ठहराने की कोशिश होती है

सबसे बड़ा सवाल प्रशासन से है—
क्या यह सब उन्हें दिखाई नहीं देता?
या फिर यह सब देखकर भी अनदेखा करने की आदत बन चुकी है?

और जिम्मेदारी केवल प्रशासन की ही नहीं है। जनता भी बराबर की भागीदार है। हम खुद ऐसे अतिक्रमणों को बढ़ावा देते हैं—कभी आस्था के नाम पर, कभी सुविधा के नाम पर, और फिर जब समस्या बढ़ती है, तो हम ही सड़क पर उतरकर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं।

अब समय आ गया है कि जनता समझे—
👉 आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन कानून और व्यवस्था उससे ऊपर है।
👉 अवैध को समर्थन देना, अपने ही शहर को अव्यवस्थित करने जैसा है।
👉 सवाल उठाना और जवाब मांगना हर नागरिक का कर्तव्य है।

अगर अब भी हम नहीं जागे, तो शहर की हर सड़क, हर चौराहा अतिक्रमण और टकराव का अखाड़ा बन जाएगा

निर्णय अब प्रशासन को लेना है—और जागरूकता जनता को दिखानी है।

2 thoughts on “आस्था या अतिक्रमण? प्रशासन की चुप्पी से सड़कों पर बढ़ता टकराव

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