
जिन धाराओं के किनारे बसा रीवा, उन्हीं नदियों ने गढ़ी शहर की पहचान; पहाड़ों से निकलती हैं जलधाराएं, इतिहास के घाटों को छूती हुई आगे बढ़ती हैं और फिर बड़े नदी तंत्र का हिस्सा बन जाती हैं
रीवा। रीवा को समझना है तो उसकी नदियों को समझना होगा। शहर की पहचान केवल किले, महलों, मंदिरों और जलप्रपातों से नहीं बनी, बल्कि उन जलधाराओं ने भी रीवा की सभ्यता को आकार दिया है, जो सदियों से पहाड़ों और पठारों के बीच अपना रास्ता बनाती हुई यहां तक पहुंचती रही हैं।बीहर और बिछिया—रीवा के लिए ये सिर्फ दो नदियों के नाम नहीं हैं। इनके किनारे शहर की स्मृतियां बसी हैं, पुराने घाटों ने समय को गुजरते देखा है और इन्हीं जलधाराओं ने विंध्य की धरती को प्रकृति का ऐसा स्वरूप दिया है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।लेकिन इन नदियों की कहानी रीवा शहर से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआत उन पहाड़ियों से होती है, जहां छोटी-सी जलधारा धीरे-धीरे नदी का रूप लेती है और फिर अपने लंबे सफर में इतिहास, भूगोल और प्रकृति को जोड़ती चली जाती है।
कैमोर की पहाड़ियों से निकलकर रीवा तक पहुंचती है बीहर
बीहर नदी का उद्गम सतना जिले के अमरपाटन क्षेत्र में खरमखेड़ा गांव के पास कैमोर पर्वत क्षेत्र से माना जाता है। पहाड़ी क्षेत्र से निकलने के बाद बीहर अमरपाटन के इलाकों, मुकुंदपुर और आगे रीवा क्षेत्र की ओर बढ़ती है।करीब 97 किलोमीटर का सफर तय करने वाली यह नदी जैसे-जैसे पठारी भूभाग की ओर बढ़ती है, उसका स्वरूप बदलता जाता है। कहीं शांत धारा, कहीं चट्टानों के बीच रास्ता बनाती जलधारा और फिर अचानक ऊंचाई से गिरता पानी—बीहर का यही बदलता रूप इसे रीवा की सबसे चर्चित नदियों में शामिल करता है।और इसी यात्रा में आता है चचाई।
जहां नदी ने पहाड़ को चीरकर बना दिया चचाई
रीवा के प्राकृतिक वैभव की बात हो और चचाई जलप्रपात का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं।बीहर नदी पठारी क्षेत्र से नीचे उतरते हुए चचाई के पास एक विशाल जलप्रपात का रूप लेती है। ऊंचाई के आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में अलग मिलते हैं, लेकिन लगभग 115 से 130 मीटर की ऊंचाई से गिरती जलधारा चचाई को विंध्य के सबसे प्रभावशाली प्राकृतिक दृश्यों में शामिल करती है।यह सिर्फ पानी का गिरना नहीं है।यह हजारों वर्षों से प्रकृति द्वारा तैयार किया गया वह दृश्य है, जहां चट्टान, ऊंचाई और पानी मिलकर ऐसा संसार बनाते हैं जिसे कैमरे में कैद किया जा सकता है, लेकिन उसकी पूरी भव्यता शब्दों में बताना मुश्किल है।
बिछिया की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं
रीवा की दूसरी महत्वपूर्ण नदी है बिछिया।बताया जाता है कि बिछिया नदी का उद्गम मऊगंज जिले के खैरा-कनकेसरा गांव के पास सीतापुर पहाड़ी क्षेत्र से होता है। वहां से निकलकर यह नदी गुर्गी, लक्ष्मणबाग और रीवा के ऐतिहासिक क्षेत्रों से होकर आगे बढ़ती है।लगभग 45 से 50 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद बिछिया रीवा के उस क्षेत्र में पहुंचती है, जहां उसका बीहर से मिलन होता है।और यही वह स्थान है जहां नदी की कहानी इतिहास से मिलती है।
राजघाट—जहां दो नदियां एक हो जाती हैं
रीवा किले के पीछे स्थित राजघाट के आसपास बीहर और बिछिया का संगम होता है।यह केवल दो नदियों का मिलन नहीं है। यह रीवा के पुराने शहर, घाटों, बस्तियों और विरासत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण भू-दृश्य है।एक तरफ बीहर अपने लंबे सफर के बाद यहां पहुंचती है, दूसरी ओर बिछिया अपनी अलग यात्रा पूरी करके आती है और फिर दोनों की धाराएं एक हो जाती हैं।यही संगम रीवा की नदी सभ्यता की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करता है, जिसे आधुनिक शहर के शोर में हम अक्सर भूल जाते हैं।
लेकिन रीवा की नदी कहानी यहां खत्म नहीं होती
बीहर और बिछिया के बाद नजर जाती है टमस या टोंस नदी की ओर।विंध्य क्षेत्र की यह महत्वपूर्ण नदी कैमोर पर्वत क्षेत्र से निकलकर मैहर, सतना और रीवा के भूभाग से गुजरती हुई आगे उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ती है। प्रयागराज क्षेत्र में सिरसा के पास यह गंगा नदी में समाहित होती है।यानी विंध्य की पहाड़ियों में जन्म लेने वाली एक जलधारा अंततः गंगा के विशाल नदी तंत्र तक पहुंचती है।यही किसी नदी की असली यात्रा है—एक छोटी जलधारा से शुरुआत और अंततः एक विराट नदी तंत्र का हिस्सा बन जाना।
महाना और क्योटी—रीवा की एक और प्राकृतिक कहानी
रीवा के नदी संसार में महाना नदी का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसे टमस की प्रमुख सहायक नदी माना जाता है और इसका प्रवाह सिरमौर क्षेत्र से जुड़ा है।इसी नदी से जुड़ा है रीवा का प्रसिद्ध क्योटी जलप्रपात।रीवा शहर से करीब 37 किलोमीटर और सिरमौर से लगभग 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित क्योटी अपनी ऊंचाई और प्राकृतिक संरचना के कारण विंध्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिना जाता है।हालांकि क्योटी जलप्रपात को लेकर अलग-अलग स्रोतों में इसकी नदी और ऊंचाई के संबंध में अंतर मिलता है। इसलिए नदी-प्रणाली को समझाते समय इसे सावधानी से प्रस्तुत करना जरूरी है।
रीवा की पहचान सिर्फ जलप्रपातों से नहीं, पूरी नदी व्यवस्था से है
अगर पूरे नदी तंत्र को सरल भाषा में समझें तो तस्वीर कुछ इस तरह बनती है—बीहर पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर रीवा की ओर आती है और आगे चचाई जलप्रपात का निर्माण करती है।बिछिया अलग भूभाग से निकलकर रीवा के राजघाट क्षेत्र में बीहर से मिलती है।महाना टमस की प्रमुख सहायक नदी है और क्योटी जलप्रपात से इसका प्राकृतिक संबंध जुड़ा है।और टमस या टोंस इन जलधाराओं को अपने बड़े नदी तंत्र में समेटते हुए अंततः गंगा तक पहुंचती है।
नदियां सूखेंगी तो सिर्फ पानी नहीं जाएगा, रीवा की पहचान का एक हिस्सा भी चला जाएगा
आज जब रीवा बाढ़, जलभराव, नदी प्रदूषण और नदी किनारों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब इन नदियों की कहानी को सिर्फ पर्यटन की कहानी समझना भूल होगी।ये नदियां खेती से जुड़ी हैं। गांवों से जुड़ी हैं। शहर की पुरानी बस्तियों से जुड़ी हैं। जलप्रपातों से जुड़ी हैं। और सबसे बढ़कर रीवा की सामूहिक स्मृति से जुड़ी हैं।जिस बीहर को हम शहर के बीच से गुजरती एक नदी के रूप में देखते हैं, उसकी शुरुआत कहीं दूर कैमोर की पहाड़ियों में एक छोटी धारा के रूप में होती है।जिस बिछिया को हम राजघाट के पास देखते हैं, उसकी अपनी अलग पहाड़ी यात्रा है।और जिन दोनों धाराओं का संगम रीवा में होता है, उनकी कहानी आगे जाकर विंध्य की बड़ी नदी व्यवस्था में समा जाती है।इसलिए रीवा की नदियों को देखना सिर्फ पानी को देखना नहीं है। यह पहाड़ से मैदान तक, गांव से शहर तक, इतिहास से वर्तमान तक और स्थानीय धारा से गंगा तक जाती एक ऐसी जीवित कहानी को देखना है, जिसने सदियों से इस भूभाग को आकार दिया है।बीहर से बिछिया, राजघाट से चचाई और महाना से क्योटी तक—रीवा की असली खूबसूरती उसके नक्शे पर नहीं, उसकी नदियों की धड़कन में छिपी है।
