बसों का ब्रेक या सत्ता की परीक्षा? मोदी सभा से तय होगा दबाव बनाम सिस्टम का भविष्य

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अजमेर । राजस्थान की सड़कों पर खड़ी निजी बसें इस समय सिर्फ परिवहन व्यवस्था के ठहरने का संकेत नहीं दे रहीं, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति, प्रशासनिक क्षमता और संगठित दबाव की ताकत के बीच शुरू हुई एक बड़ी लड़ाई है।

 राजस्थान प्राइवेट बस ऑपरेटर्स यूनियन द्वारा सोमवार रात 12 बजे से शुरू किया गया अनिश्चितकालीन चक्का जाम अब सीधे सत्ता की प्रतिष्ठा से जुड़ गया है। कारण साफ है—28 फरवरी को नरेन्द्र मोदी की अजमेर के कायड़ विश्राम स्थली पर प्रस्तावित विशाल आमसभा, जिसे लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक मशीनरी पूरी ताकत से जुटी हुई है।

बस ऑपरेटरों का ऐलान कि प्रधानमंत्री की सभा के लिए एक भी निजी बस उपलब्ध नहीं करवाई जाएगी, सरकार के लिए खुली चुनौती है। नियमों को लेकर मतभेद, टैक्स भार, परमिट नियमों, ई-चालान और कार्रवाई को लेकर नाराज़ चल रहे परिवहन व्यवसायियों ने इस बार आंदोलन को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां असर सीधे राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पर पड़ सकता है। यही वजह है कि जयपुर से लेकर अजमेर तक प्रशासनिक हलकों में असामान्य सक्रियता दिखाई दे रही है।

असल चिंता भीड़ की राजनीति को लेकर है। राजस्थान की किसी भी बड़ी सभा की सफलता गांवों से आने वाली भीड़ पर निर्भर करती है और यह भीड़ निजी बसों के सहारे ही पहुंचती है। यदि हड़ताल जारी रहती है तो दूरदराज़ इलाकों से आने वाले समर्थकों, कार्यकर्ताओं और आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होना तय है। सरकारी परिवहन व्यवस्था सीमित है और अचानक लाखों लोगों की आवाजाही संभालना आसान नहीं होगा। ऐसे में सभा की अनुमानित भीड़ और राजनीतिक संदेश दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

अब सवाल यह है कि सरकार क्या करेगी—संवाद या सख्ती? राजनीतिक अनुभव बताता है कि जब मामला प्रधानमंत्री की सभा से जुड़ जाए तो समाधान अक्सर अंतिम क्षणों में निकलता है। संभव है सरकार बातचीत के जरिए राहत का संकेत दे, लेकिन यह भी उतना ही संभव है कि प्रशासन कानून और परमिट कार्रवाई के जरिए दबाव बनाकर हड़ताल तोड़ने की कोशिश करे। तीसरी और सबसे व्यावहारिक संभावना बस ऑपरेटरों के भीतर मतभेद की भी है, जहां कुछ संचालक आंदोलन जारी रखें और कुछ सरकारी या राजनीतिक दबाव में बसें उपलब्ध करवा दें।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा परेशान आम ग्रामीण जनता है। छात्र, मजदूर, व्यापारी और मरीज—सभी निजी बस व्यवस्था पर निर्भर हैं। आंदोलन लंबा खिंचा तो यह सिर्फ राजनीतिक टकराव नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असुविधा का संकट बन जाएगा।

दरअसल, यह संघर्ष सिर्फ किराए, टैक्स या परमिट का नहीं है। यह उस सवाल का जवाब खोज रहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संगठित आर्थिक समूह कितना दबाव बना सकते हैं और सरकार अपनी प्रशासनिक शक्ति कितनी प्रभावी ढंग से लागू कर सकती है। 28 फरवरी की अजमेर सभा अब महज राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रही—यह शक्ति संतुलन की परीक्षा बन चुकी है।

राजस्थान की सियासत इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। बसों के पहिए रुके हैं, लेकिन राजनीतिक संदेश तेज गति से आगे बढ़ रहा है। अब देखना यही है कि पहले कौन झुकता है—सिस्टम या संगठन। संभव है समझौता हो जाए, संभव है सख्ती दिखाई जाए, लेकिन इतना तय है कि अजमेर की यह सभा आने वाले समय की राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा तय कर सकती है।

क्योंकि कभी-कभी इतिहास मंच पर दिए गए भाषणों से नहीं, बल्कि वहां तक पहुंचने वाली बसों से लिखा जाता है।

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