अजमेर की सियासत में फाइलों का धर्मयुद्ध?
अजमेर। निकाय चुनाव से पहले अजमेर की राजनीति में पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत और विधानसभा अध्यक्ष एवं अजमेर उत्तर विधायक वासुदेव देवनानी के बीच सामने आया विवाद शहर की सियासत को नई दिशा देता दिखाई दे रहा है। गहलोत के भाजपा से इस्तीफे और देवनानी पर लगाए गए आरोपों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में यह विवाद किस मोड़ पर पहुंचेगा।
मामला केवल दो नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद का नहीं रह गया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या दोनों पक्ष एक-दूसरे से जुड़े पुराने मामलों और फाइलों को सार्वजनिक करेंगे? क्या आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होगा? या फिर निकाय चुनाव के राजनीतिक समीकरणों के बीच कोई समझौता अथवा नया गठबंधन देखने को मिलेगा?
धर्मेंद्र गहलोत ने अपने इस्तीफे के बाद देवनानी को खुली चुनौती देते हुए राजनीतिक संघर्ष जारी रखने की बात कही है। दूसरी ओर, गहलोत से जुड़े पुराने नगर निगम मामलों में स्वायत्त शासन विभाग की ओर से जारी नोटिस भी राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गए हैं। हालांकि इन मामलों की अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में ‘फाइलों की राजनीति’ अजमेर के चुनावी मैदान में बड़ा मुद्दा बनेगी? यदि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर पुराने मामलों को लेकर खुलकर हमला करते हैं तो चुनावी माहौल व्यक्तिगत आरोपों और राजनीतिक टकराव की ओर जा सकता है।
लेकिन अजमेर की जनता के सामने इससे भी बड़ा सवाल है—आखिर शहर को अब तक क्या मिला? सड़क, पानी, सीवरेज, सफाई, यातायात, पार्किंग, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण, अवैध निर्माण, पर्यटन और आनासागर जैसे शहर के मूल मुद्दों पर कितना काम हुआ और कितना काम अभी बाकी है?
जनता यह भी पूछ सकती है कि यदि किसी जनप्रतिनिधि या पदाधिकारी के खिलाफ गंभीर शिकायतें या फाइलें मौजूद थीं, तो उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि आरोप राजनीतिक रूप से लगाए जा रहे हैं तो उनके जवाब भी दस्तावेजों और तथ्यों के साथ सामने क्यों नहीं रखे जाते?
निकाय चुनाव के बीच यह भी देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद ‘धर्मयुद्ध’ का रूप लेता है या राजनीतिक परिस्थितियां दोनों पक्षों को किसी नए समीकरण की ओर ले जाती हैं। राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं और चुनावी गणित कई बार पुराने विरोधियों को भी एक मंच पर ला देता है।
भाजपा के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। धर्मेंद्र गहलोत अजमेर की स्थानीय राजनीति में जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं और पूर्व महापौर के रूप में उनका राजनीतिक प्रभाव रहा है। ऐसे में पार्टी के सामने चुनौती है कि वह आंतरिक विवाद को किस तरह संभालती है और निकाय चुनाव में संगठन तथा कार्यकर्ताओं को किस मुद्दे पर एकजुट करती है।
वहीं विपक्ष के सामने भी अवसर है, लेकिन केवल भाजपा के अंदरूनी विवाद को मुद्दा बनाकर चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। जनता विपक्ष से भी पूछेगी कि यदि उसे नगर निगम की सत्ता मिलती है तो अजमेर के विकास के लिए उसकी प्राथमिकताएं क्या होंगी और शहर की पुरानी समस्याओं का समाधान किस तरीके से किया जाएगा।
इस बार निकाय चुनाव को केवल पार्षद चुनने की प्रक्रिया के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। यह चुनाव अजमेर की स्थानीय राजनीति की दिशा तय करने वाला चुनाव हो सकता है। पुराने राजनीतिक चेहरों की पकड़, नए चेहरों की दावेदारी, दलों के अंदरूनी समीकरण और स्थानीय मुद्दे—सभी की परीक्षा इस चुनाव में होगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार चुनाव नेताओं के बीच मुकाबला रहेगा या जनता अपने मुद्दों को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाएगी? क्या मतदाता आरोप-प्रत्यारोप से प्रभावित होगा या अपने वार्ड की सड़क, नाली, सफाई, पानी, बिजली, पार्किंग और विकास कार्यों के आधार पर वोट करेगा?
निकाय चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ राजनीतिक तस्वीर और साफ होगी। कौन किसके साथ खड़ा होता है, कौन चुनाव मैदान में उतरता है और कौन किसके खिलाफ मोर्चा खोलता है—इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।
लेकिन अंततः सबसे बड़ी ‘फाइल’ जनता के पास है। इस फाइल में किसी नेता के खिलाफ कोई सरकारी आरोप नहीं, बल्कि पिछले वर्षों के कामकाज का हिसाब दर्ज है। जनता देख रही है कि किसने उसके क्षेत्र के लिए क्या किया, किसने आवाज उठाई और किसने केवल राजनीति की।
इसलिए इस बार अजमेर की जनता के सामने सवाल केवल “कौन जीतेगा?” का नहीं है। सवाल यह भी है कि “जीतने के बाद अजमेर को क्या मिलेगा?”
क्या एक-दूसरे की फाइलें खुलेंगी? क्या राजनीतिक टकराव बढ़ेगा? क्या किसी स्तर पर समझौता या गठबंधन होगा? या फिर निकाय चुनाव वास्तव में देवनानी और गहलोत जैसे राजनीतिक चेहरों की प्रतिष्ठा की परीक्षा बन जाएगा?
11 सितंबर का मतदान इन सवालों का जवाब देने की दिशा में पहला बड़ा कदम होगा। इसके बाद परिणाम बताएंगे कि अजमेर की जनता ने आरोपों की राजनीति को महत्व दिया या विकास और स्थानीय मुद्दों को।
आखिरकार फैसला नेताओं के मंच से नहीं, अजमेर की जनता की अदालत से होगा।
इस बार असली सवाल यही है—
फाइलें खुलेंगी या गठबंधन होगा?
राजनीतिक धर्मयुद्ध होगा या समझौते की पटकथा लिखी जाएगी?
और सबसे बड़ा सवाल—अब तक अजमेर को क्या मिला और आगे अजमेर की जनता क्या चाहती है?
इस बार निकाय चुनाव सिर्फ पार्षद चुनने की परीक्षा नहीं, बल्कि अजमेर की राजनीति और उसके भविष्य की भी परीक्षा है।
