कहानी : चश्मे वाला कछुआ और स्क्रॉल करता खरगोश

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बहुत पुरानी बात है — इतनी पुरानी कि उस समय भी लोग कहते थे “आजकल के बच्चे बिगड़ गए हैं।” उसी जंगल में एक कछुआ रहता था, नाम था धीरज। उम्र के साथ उसकी आँखें कमजोर हो गई थीं, तो उसने एक चश्मा बनवा लिया। चश्मा लगाते ही वह दुनिया को पहले से ज्यादा साफ देखने लगा — और यहीं से उसकी मुसीबत शुरू हुई।

धीरज चश्मे से देखता : तालाब का पानी हरा, पेड़ों की जड़ें उखड़ी, पक्षियों के घोंसले बंदरों के पत्थरों से गिरे हुए। वह हर किसी को बताता फिरता — “भाई, यह ठीक नहीं हो रहा।” जंगलवाले उसकी बात काट देते — “अरे बूढ़े, तुम्हारी आँखें ही कमजोर हैं, चश्मा उतारो।” धीरज उतारता नहीं था। चश्मा उसकी आँख नहीं, आदत बन गया था — सच देखने की आदत।

उसी जंगल में एक खरगोश रहता था, नाम था स्क्रॉल। स्क्रॉल दिनभर अपने जादुई पत्ते (जिसे आज हम फोन कहते हैं) पर उँगली घुमाता रहता। जंगल की हर खबर उसे पत्ते से मिलती थी — कौन जीता, कौन हारा, किसने किसको काटा, किसका वीडियो वायरल हुआ। स्क्रॉल जंगल की असल हालत कभी अपनी आँखों से देखता ही नहीं था। उसे लगता — “मुझे सब पता है।”

एक दिन जंगल में आग लगी। स्क्रॉल ने पत्ते पर पढ़ा — “आग की खबर, बड़ी खबर, क्लिक करें।” उसने पत्ता स्क्रॉल करना जारी रखा, क्योंकि नीचे किसी ने कमेंट किया था कि आग सिर्फ अफवाह है। धीरज ने अपने चश्मे से दूर देखा — धुआँ असली था। वह धीरे-धीरे सबको बताने निकला। स्क्रॉल हँसा — “बूढ़े, तुम्हारा चश्मा ही धोखा दे रहा है। मेरे पत्ते पर एक्सपर्ट ने कहा है — अफवाह है।”

धीरज ने कहा — “बेटा, पत्ता खबर देता है, आँख गवाही देती है। दोनों अलग चीजें हैं।”

आग फैली। स्क्रॉल का पत्ता तो बच गया, मगर उसका घर जल गया। तब स्क्रॉल ने पहली बार पत्ता जेब में रखा और अपनी आँखों से देखा — जंगल जल रहा था, और जो “एक्सपर्ट” अफवाह कह रहे थे, वे कहीं और बैठे चाय पी रहे थे।

धीरज ने उसे अपने चश्मे से देखने को कहा। स्क्रॉल ने पहली बार देखा — आग के पीछे एक और सच था : जंगल के कुछ जानवर जानबूझकर आग फैला रहे थे, ताकि उनकी जमीन हड़पी जा सके। यह बात किसी पत्ते पर नहीं थी। यह बात देखने पर थी।

कहानी का ज्ञान :

युवाओं के लिए — स्क्रॉल करना ज्ञान नहीं, सिर्फ जानकारी है। जानकारी किसी और ने छानकर दी है; ज्ञान अपनी आँखों से देखकर बनता है। पत्ता आपको बताएगा कि आग अफवाह है; आपको खुद जाकर धुआँ देखना होगा।

बुजुर्गों के लिए — चश्मा कमजोरी नहीं, अनुभव है। मगर चश्मा भी तब काम आता है जब आप उसे बेटे-पोतों को पहनने दें, सिर्फ “तुम्हारी आँखें कमजोर हैं” कहकर उतारने को न कहें। अनुभव की कीमत तभी है जब वह नई पीढ़ी के पत्ते के साथ मिलकर चले।

और सबके लिए एक बात — पत्ता बदलता रहेगा, आग नहीं। जो आग आज अफवाह कही जा रही है, वह कल आपका घर जला सकती है। सवाल यह नहीं कि किसका पत्ता सही है; सवाल यह है कि क्या आपने अपना चश्मा पहना है?

धीरज आज भी जंगल में घूमता है, चश्मा लगाए। स्क्रॉल अब पत्ता जेब में रखकर चलता है। और जंगल के बाकी जानवर — वे अब भी कहते हैं “आजकल के बच्चे बिगड़ गए हैं।” शायद इसीलिए जंगल में आग लगती रहती है। लेखक – देवप्रीत

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