संपादकीय– देवेन्द्र सक्सैना
“आवाज़ उठी है… अब बदलाव की बारी है”
कभी-कभी इतिहास बड़े आंदोलनों से नहीं, बल्कि छोटे दिखने वाले प्रतीकों से करवट लेता है। आज देश में चर्चा का विषय बनी “कॉकरोच जनता पार्टी” भी शायद ऐसी ही एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। कोई इसे व्यंग्य कह रहा है, कोई विरोध और कोई व्यवस्था के प्रति बढ़ती नाराज़गी का संकेत। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता—क्या देश का आम नागरिक खुद को सुना हुआ महसूस कर रहा है?
भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरिक्ष से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, हर क्षेत्र में देश नई ऊंचाइयां छू रहा है। लेकिन दूसरी ओर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक अवसरवाद और बढ़ती सामाजिक दूरी जैसे मुद्दे भी हमारे सामने खड़े हैं। विकास की चमक के पीछे यदि व्यवस्था की दीवारें खोखली हो रही हों, तो यह चिंता का विषय है।
देश का सबसे बड़ा संकट बाहरी नहीं, आंतरिक होता है। इतिहास बताता है कि कोई भी राष्ट्र बाहरी हमलों से उतना नहीं टूटता, जितना अंदर पैदा हुए अविश्वास, भ्रष्टाचार और स्वार्थ से टूटता है। जब जनता को लगता है कि उसकी समस्याएं केवल चुनावी भाषणों तक सीमित हैं, तब असंतोष जन्म लेता है। और जब असंतोष बढ़ता है, तो वह आंदोलन बनता है।
लेकिन हर आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य समाधान भी होना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि सरकारें केवल योजनाओं की घोषणाएं न करें, बल्कि उनके परिणाम भी जनता तक पहुंचें। प्रशासन केवल फाइलों में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई दे। राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का संकल्प बने।
युवाओं के लिए एक प्रेरक उदाहरण
सन् 1905 में एक साधारण भारतीय छात्र ने स्कूल में अपने शिक्षक से पूछा था—”क्या हम हमेशा गुलाम रहेंगे?” उस छात्र का नाम था । उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बालक आगे चलकर करोड़ों युवाओं की प्रेरणा बनेगा।
भगत सिंह के पास न सत्ता थी, न धन और न कोई बड़ा पद। उनके पास केवल एक चीज़ थी—अपनी आवाज़ उठाने का साहस।
आज देश के युवाओं को हथियार नहीं, बल्कि विचार उठाने हैं। क्रांति अब बंदूकों से नहीं, बल्कि ईमानदारी, शिक्षा, नवाचार, सामाजिक जागरूकता और जनभागीदारी से होगी। यदि एक युवा रिश्वत देने से इंकार करता है, एक छात्र अपने अधिकारों के लिए प्रश्न पूछता है, एक नागरिक गलत को गलत कहने का साहस करता है—तो वही आधुनिक भारत की सबसे बड़ी क्रांति होगी।
अब समय दर्शक बनने का नहीं
सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख देना आसान है। किसी मुद्दे पर दो मिनट गुस्सा दिखाना भी आसान है। लेकिन देश बदलते हैं उन लोगों से जो शिकायत के साथ समाधान भी खोजते हैं।
यदि सड़क टूटी है तो सवाल पूछिए। यदि भ्रष्टाचार दिखे तो आवाज़ उठाइए। यदि व्यवस्था में खामी है तो सुधार का सुझाव दीजिए। यदि समाज बंट रहा है तो उसे जोड़ने का प्रयास कीजिए।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा नेता वह नहीं जो मंच पर खड़ा है, बल्कि वह नागरिक है जो अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों को समझता है।
देश को बचाना है तो जड़ों को मजबूत करना होगा
आज सबसे पहले भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार करने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार केवल सरकारी दफ्तरों में नहीं होता, वह तब भी होता है जब हम सुविधा के लिए नियम तोड़ते हैं, जब हम गलत को देखकर चुप रहते हैं और जब हम अपने स्वार्थ को राष्ट्रहित से ऊपर रख देते हैं।
यदि इन जड़ों को नहीं काटा गया तो यह धीरे-धीरे ऐसा आंतरिक संकट बन सकता है जो देश की प्रगति को भीतर से खा जाएगा। उस समय सरकारें भी सीमित हो जाएंगी और समाज भी कमजोर।
अंतिम बात
भारत केवल सरकारों का नहीं, हम सबका है। इसकी संस्कृति, सभ्यता, लोकतंत्र और भविष्य किसी एक दल या व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। यह जिम्मेदारी हर उस युवा की है जो बेहतर भारत का सपना देखता है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” की चर्चा ने कम से कम एक बात तो साबित कर दी है—आवाज़ चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, यदि उसमें सच्चाई और जनभावना हो तो वह पूरे देश का ध्यान खींच सकती है।
अब प्रश्न यह नहीं है कि कौन बोल रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हम सुन रहे हैं?
प्रश्न यह है कि—क्या हम बदलाव के लिए तैयार हैं?
“युवा जागेगा, तो भारत आगे बढ़ेगा।”
