प्रयागराज, 2 मई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निजी संपत्ति पर धार्मिक प्रार्थनाएं की जा सकती हैं, लेकिन यदि वहां नियमित, संगठित या बड़े पैमाने पर सामूहिक गतिविधियां होने लगें, तो वे सरकारी नियमों और स्थानीय कानूनों के अधीन होंगी।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने कहा कि कभी-कभार और सीमित दायरे में की जाने वाली निजी प्रार्थनाएं संरक्षित हैं, बशर्ते उनसे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित न हो। हालांकि, जब किसी परिसर का उपयोग लगातार सामूहिक धार्मिक आयोजनों के लिए होने लगे, तो इसे भूमि उपयोग में बदलाव माना जाएगा और उस पर प्रशासनिक व नियामक प्रावधान लागू होंगे।
अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक भूमि का किसी विशेष धार्मिक उद्देश्य के लिए स्थायी या बार-बार उपयोग नहीं किया जा सकता। राज्य की जिम्मेदारी है कि ऐसी भूमि पर सभी नागरिकों की समान पहुंच सुनिश्चित की जाए।
पीठ ने अपने पूर्व निर्णयों—‘मुनाज़िर खान बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ और ‘मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’—का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि इनका अर्थ यह नहीं है कि निजी परिसर में होने वाली हर प्रकार की सामूहिक धार्मिक गतिविधि नियमों से मुक्त है। ये फैसले केवल सीमित निजी प्रार्थनाओं तक ही सुरक्षा प्रदान करते हैं।
मामले में संभल जिले के ‘असीन’ नामक व्यक्ति ने एक भूमि पर नमाज अदा करने के लिए अनुमति और सुरक्षा की मांग की थी। उसने गिफ्ट डीड के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया और इसे संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 के तहत अपना अधिकार बताया।
राज्य ने दलील दी कि संबंधित भूमि ‘आबादी भूमि’ है, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए होती है। अदालत ने पाया कि स्वामित्व का दावा स्पष्ट नहीं है और याचिकाकर्ता वहां नई धार्मिक गतिविधि नियमित रूप से शुरू करना चाहता है, जो पहले केवल विशेष अवसरों तक सीमित थी।
इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि कोई लागू करने योग्य कानूनी अधिकार नहीं बनता और याचिका खारिज कर दी, साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
