रीवा GMH में जच्चा-बच्चा की मौत पर बड़ी कार्रवाई, दो डॉक्टरों समेत चार निलंबित

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इलाज में कथित लापरवाही के आरोपों के बीच प्रशासन का बड़ा कदम, जांच समिति करेगी पूरे घटनाक्रम की पड़ताल; परिजनों के आरोपों और वायरल वीडियो ने उठाए गंभीर सवाल

रीवा। गांधी स्मारक चिकित्सालय (GMH) में 25 वर्षीय गर्भवती महिला कल्पना मिश्रा और उसके अजन्मे बच्चे की मौत के मामले ने पूरे रीवा को झकझोर दिया है। मामले में लगातार उठ रहे सवालों और परिजनों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के बीच प्रशासन ने अब बड़ी कार्रवाई करते हुए दो ड्यूटी डॉक्टरों समेत चार स्वास्थ्यकर्मियों को निलंबित कर दिया है। कार्रवाई के साथ ही पूरे घटनाक्रम की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी गई है। इस मामले ने एक बार फिर प्रदेश के बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा, इलाज की व्यवस्था और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।जानकारी के अनुसार रीवा जिले के हटवा गांव निवासी 25 वर्षीय कल्पना मिश्रा को 26 अगस्त की सुबह प्रसव के लिए गांधी स्मारक चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। परिवार को उम्मीद थी कि अस्पताल में सुरक्षित इलाज के बाद मां और बच्चा स्वस्थ घर लौटेंगे, लेकिन उसी रात हालात ने ऐसा मोड़ लिया कि परिवार की खुशियां मातम में बदल गईं। कल्पना मिश्रा और उसके अजन्मे बच्चे की मौत हो गई। घटना के बाद परिजनों ने अस्पताल में इलाज के दौरान गंभीर लापरवाही, व्यवस्थाओं की कमी और स्टाफ के कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगाए।इस पूरे मामले में सामने आया वायरल वीडियो भी लोगों के बीच चर्चा का बड़ा कारण बना। वीडियो में मरीज द्वारा अपने परिवार से अस्पताल से ले जाने की गुहार लगाए जाने का दावा किया गया है। इस वीडियो ने घटना को लेकर लोगों के भीतर आक्रोश और सवाल दोनों बढ़ा दिए। हालांकि वीडियो और इलाज से जुड़े तमाम तथ्यों की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

दो डॉक्टर तत्काल प्रभाव से निलंबित

मामले की गंभीरता को देखते हुए श्याम शाह चिकित्सा महाविद्यालय के डीन/सीईओ डॉ. सुनील अग्रवाल ने 28 अगस्त को कार्रवाई करते हुए प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की ड्यूटी डॉक्टर डॉ. सोनल अग्रवाल तथा एनेस्थीसिया विभाग की ड्यूटी डॉक्टर डॉ. निधि पाण्डेय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। आदेश में प्रथम दृष्टया दोनों के विरुद्ध कार्य के प्रति घोर लापरवाही एवं गंभीर अनुशासनहीनता का उल्लेख किया गया है।निलंबन अवधि में दोनों चिकित्सकों को जीएमएच अधीक्षक कार्यालय में पदस्थ रहने तथा नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने के निर्देश हैं। इससे पहले मामले में दो नर्सिंग ऑफिसरों को भी निलंबित किया जा चुका है। उपलब्ध रिपोर्टों में दूसरे नर्सिंग अधिकारी के नाम को लेकर अंतर सामने आया है, इसलिए आधिकारिक रिकॉर्ड से नाम की पुष्टि किया जाना जरूरी है।

ब्लड से लेकर एनेस्थीसिया तक जांच के दायरे में

अब जांच केवल डॉक्टरों की भूमिका तक सीमित नहीं रहने वाली है। शासन द्वारा वरिष्ठ चिकित्सकों की जांच समिति गठित की गई है, जो मरीज के भर्ती होने से लेकर मौत तक के पूरे घटनाक्रम की चिकित्सकीय समीक्षा करेगी। जांच में बाहर से मंगाए गए ब्लड ट्रांसफ्यूजन, एनेस्थीसिया से जुड़े पहलुओं और इलाज के दौरान अपनाई गई पूरी प्रक्रिया की भी पड़ताल की जा रही है।मेडिकल रिकॉर्ड में मरीज का प्लेटलेट काउंट बेहद कम होने के साथ गंभीर हाई ब्लड प्रेशर और लिवर एंजाइम बढ़ने जैसी स्थितियां दर्ज होने की बात सामने आई है। ऐसे में यह पता लगाना जांच का अहम हिस्सा होगा कि मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए समय पर कौन-कौन से चिकित्सकीय निर्णय लिए गए, उनका पालन किस स्तर तक हुआ और मौत को रोकने के लिए उपलब्ध चिकित्सा संसाधनों का कितना प्रभावी इस्तेमाल किया गया।

अब रिपोर्ट तय करेगी जिम्मेदारी

पूरे मामले में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और जांच समिति की रिपोर्ट को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जांच में यदि किसी चिकित्सक, नर्सिंग स्टाफ अथवा अन्य कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।इस मामले में उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला द्वारा जांच के निर्देश दिए जाने के बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई तेज हुई है। अब निगाह जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी है।एक मां की मौत और उसके अजन्मे बच्चे की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह सवाल उस पूरी चिकित्सा व्यवस्था से है, जहां इलाज के लिए आने वाला हर मरीज अस्पताल से सुरक्षित लौटने की उम्मीद लेकर आता है। निलंबन की कार्रवाई पहला कदम है—अब असली परीक्षा निष्पक्ष जांच की है। यदि लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और यदि आरोप तथ्यों से परे हैं तो वह भी जांच के जरिए स्पष्ट होना चाहिए।

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