अजमेर नगर निगम का अतिक्रमण हटाने का अभियान दशकों से चल रहा है, पर शहर की हालात देखकर यह कहना पड़ता है कि अभियान सिर्फ कागज़ों पर आगे बढ़ा है, जमीन पर नहीं। सड़कें हों या बाजार, पर्यटन स्थल हों या मंदिरों के बाहर की जगह—अतिक्रमण बढ़ता ही गया। जनता लगातार सवाल पूछ रही है कि आखिर यह सब किसकी अनदेखी से हुआ और इतने सालों में जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई?
वैशाली नगर का संतोषी माता चौराहा इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। कभी शांत और व्यवस्थित आवासीय क्षेत्र रहे इस इलाके में आज शोरूम, रूफटॉप रेस्टोरेंट, बार, इलेक्ट्रॉनिक और ज्वेलरी शॉप धड़ल्ले से खुल रहे हैं। जिन इमारतों के नक्शे आवासीय उपयोग के लिए पास हुए थे, वही इमारतें आज व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र बन गई हैं। जनता अब यह जानना चाहती है कि इन परमिशन को किस विभाग ने मंजूरी दी?
क्या आवेदन वास्तव में बदले गए?
क्या निरीक्षण कभी हुआ भी था?
या सब ‘ऊपर मंजूरी’ की छत्रछाया में होता गया?
नगर निगम की हालिया कार्रवाई भी सिर्फ दिखावा बनकर रह गई है। दो–चार ठेले हटाकर फोटो खींचना, फाइल आगे भेजना और अभियान की सफलता सोशल मीडिया पर दिखाना—यही नए कामकाज की परिभाषा बन गई है। लेकिन संतोषी माता चौराहे पर अतिक्रमण और अवैध व्यापारिक गतिविधियाँ आज पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ चुकी हैं। छोटे व्यापारियों पर कार्रवाई होती है, बड़े प्रतिष्ठानों को छूट मिलती है। जनता पूछ रही है—यह दोहरा व्यवहार आखिर क्यों?
यह स्थिति सिर्फ अव्यवस्था की नहीं, बल्कि जनता के मौलिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है। संविधान नागरिकों को “जीने का अधिकार” देता है, जिसमें सुरक्षित माहौल, शांत आवासीय क्षेत्र और स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण शामिल है। लेकिन जब आवासीय मोहल्ले में रातभर खुले रहने वाले बार, भीड़, शोर, गाड़ियाँ और अवैध पार्किंग सामान्य हो जाएँ, तो क्या जनता का यह अधिकार बचता भी है?
जनता का दूसरा बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस तरह का गैर-जिम्मेदार, ढीला और दिखावटी सिस्टम भारत को एकजुट कर पाएगा? संघ संगठनों, राजनीतिक दलों और सरकारों के बड़े-बड़े सपने तभी पूरे होंगे जब प्रशासन अपने स्तर पर न्यायपूर्ण, पारदर्शी और जिम्मेदार व्यवस्था स्थापित करे। लेकिन जब स्थानीय स्तर पर ही लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर गंभीरता नहीं दिखाई जाती, तो विश्वास कैसे बचे?
अजमेर के नागरिक आज भी यही पूछ रहे हैं—
क्या कोई शीर्ष अधिकारी इस वास्तविकता को समझकर कार्रवाई करेगा?
क्या अवैध व्यावसायिक गतिविधियों पर सख्ती होगी?
क्या जनता को मिला ‘जीवन का अधिकार’ वापस मिलेगा?
या फिर आज भी यही सोच हावी रहेगी—
“जनता जाए भाड़ में… बस फोटो भेजो और काम मान लो।”
