अजमेर। शहर में स्ट्रीट वेंडर्स को मिली हालिया राहत अब सवालों के घेरे में है। यह राहत जहां जरूरतमंदों के लिए सहारा बननी चाहिए थी, वहीं अब यह अव्यवस्था को बढ़ावा देने का माध्यम बनती दिख रही है।
जनता का कहना यह है कि न्यायपालिका की मंशा व्यवस्था सुधारने की होती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में इसके उलट तस्वीर है।
आना सागर रीजनल कॉलेज चौपाटी पर पहले चुनिंदा रेडियों को राहत मिली थी, मगर अब उसी आदेश की आड़ में वहां दोगुनी संख्या में रेडियां खड़ी हो गई हैं। क्या यह राहत थी या अतिक्रमणकारी माफियाओं को खुला निमंत्रण?
यही हाल एचकेएच और वैशाली नगर क्षेत्र का है, जहां नगर निगम ने कार्रवाई कर रेडियां हटाईं, लेकिन कुछ ही दिनों में सड़क के दोनों ओर पहले से ज्यादा अतिक्रमण खड़ा हो गया।
सबसे बड़ा सवाल—रक्षक ही भक्षक बन गए हैं क्या?
जिम्मेदार विभाग और संरक्षण देने वाले आखिर चुप क्यों हैं?
क्या एक अपराध की आड़ में नए अपराधों को संरक्षण दिया जा रहा है?
न्यायपालिका के आदेशों का पालन कराने वाले ही अगर आंख मूंद लें, तो फिर आम जनता किससे उम्मीद करे? सड़कों पर बढ़ती अव्यवस्था, जाम और हादसों का खतरा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन जिम्मेदारों की चुप्पी कई संदेह खड़े कर रही है।

अब सवाल सीधा है—
कब तक न्यायालय के आदेशों के साथ यह आंख-मिचौली चलती रहेगी?
और आखिर कब होगी उन लोगों पर सख्ती, जो राहत को ‘अराजकता का लाइसेंस’ बना चुके हैं?
👉 शहर जवाब मांग रहा है… जिम्मेदार कौन? क्या कानून की आंखों पर अभी भी पट्टी है या खुल चुकी अजमेर की जनता आने वाले समय में न्यायालय के न्याय और आदेशों का इंतजार कर रही है । क्या यह जनहित का विवाद भी सालों साल चलता रहेगा या इसका समय सीमा में ?
