हर जातिगत विवाद में नहीं लगेगा SC/ST एक्ट, आरोपों का स्पष्ट और तथ्यात्मक होना जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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अजमेर/ ​प्रयागराज। (यू.पी.)(एजेंसी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रयोग को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए किसी मामले में SC/ST एक्ट लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या जनजाति वर्ग से ताल्लुक रखता है। अदालत ने रेखांकित किया कि इस कड़े कानून के तहत कार्रवाई के लिए प्राथमिकी और साक्ष्यों में यह स्पष्ट होना अनिवार्य है कि अपराध विशेष रूप से जाति के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित करने की नीयत से ही किया गया था।

​क्या है पूरा मामला?

​यह प्रकरण उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के इटवा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। मामले के अनुसार, फर्जी जाति प्रमाण पत्र की शिकायत को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हुआ था, जो बाद में आपसी मारपीट में तब्दील हो गया।

​शिकायतकर्ता की तहरीर पर पुलिस ने मामले में भारतीय दंड संहिता की सामान्य धाराओं के साथ-साथ SC/ST एक्ट के तहत भी चार्जशीट दाखिल कर दी थी। इसके आधार पर सिद्धार्थनगर की विशेष अदालत (SC/ST कोर्ट) ने संज्ञान लेते हुए आरोपी अमरनाथ चौधरी के खिलाफ समन जारी कर दिया। इस समन आदेश और मुकदमे की वैधानिकता को आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल कर चुनौती दी थी।

​अदालत में बचाव पक्ष का तर्क

​याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दर्ज प्राथमिकी (FIR) और पुलिस की केस डायरी में कहीं भी ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि घटना के समय पीड़ित को सार्वजनिक स्थल पर जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया गया था या जाति के आधार पर निशाना बनाया गया। यह विवाद विशुद्ध रूप से एक शिकायत को लेकर उपजी रंजिश का परिणाम था, जिसमें कानून के कड़े प्रावधानों का अनावश्यक इस्तेमाल किया गया।

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​हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां

​मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी:

​आरोपों की स्पष्टता अनिवार्य: अदालत ने कहा कि SC/ST एक्ट को महज सामान्य झगड़ों या जातिगत पहचान के आधार पर यंत्रवत लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह स्पष्ट रूप से रेखांकित होना चाहिए कि कृत्य जातिगत दुर्भावना से प्रेरित था।

​दुरुपयोग पर लगाम: न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह कानून समाज के वंचित और शोषित वर्गों को संरक्षण देने के लिए बनाया गया है, न कि निजी झगड़ों और सामान्य रंजिशों में किसी पक्ष पर अनुचित दबाव बनाने या बदला लेने के साधन के रूप में।

​कोर्ट का अंतिम फैसला

​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि प्राथमिक तथ्यों में जातिगत प्रताड़ना का कोई स्पष्ट आधार मौजूद नहीं था। इसके चलते अदालत ने आरोपी अमरनाथ चौधरी के खिलाफ विशेष अदालत द्वारा जारी समन आदेश और SC/ST एक्ट की धाराओं के तहत चल रही कानूनी कार्यवाही को निरस्त (Quash) कर दिया।

​साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मारपीट और अन्य सामान्य अपराधों के संबंध में निचली अदालत में सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत मुकदमा यथावत जारी रहेगा।

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