कानून ढाल है या कमाई का जरिया? 11 मुकदमे एक ही परिवार पर दर्ज कराकर बटोरे गए सरकारी फंड, 5 मामलों में खुली पोल; अब फर्जी शिकायतकर्ताओं और झूठे गवाहों पर कानूनी शिकंजे की मांग तेज।
विशेष रिपोर्ट | डिजिटल डेस्क
अजमेर/ अलीगढ़। (यू. पी.) सामाजिक न्याय और शोषितों को संरक्षण देने के लिए बनाया गया ‘अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ क्या कुछ शातिर तत्वों के लिए निजी रंजिश साधने और सरकारी खजाने से मुआवजा बटोरने का संगठित धंधा बन चुका है? उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के इगलास थाना क्षेत्र अंतर्गत हस्तपुर गांव से सामने आया सनसनीखेज मामला इसी कड़वी हकीकत को उजागर कर रहा है।
यहाँ एक ही परिवार ने पिछले कुछ वर्षों में बैक-टू-बैक 16 आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए, जिनमें से 11 मुकदमे गांव के एक ही विशेष परिवार और उनके परिचितों पर दर्ज करवाए गए। इन मुकदमों की आड़ में सरकारी कल्याण कोष से लाखों रुपये का मुआवजा हासिल किया गया। अब जब इस पूरे सिंडिकेट की परतें खुली हैं, तो राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) की उच्चस्तरीय टीम को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा है।
मुकदमों की झड़ी और मुआवजे का ‘बिजनेस मॉडल’
हस्तपुर निवासी चंद्रपाल, उसकी पत्नी चंद्रावती और बेटे विष्णु द्वारा गांव के लोगों पर दर्ज कराए गए मुकदमों का रिकॉर्ड किसी को भी हैरान कर देगा। मामूली जमीनी कहासुनी, मेढ़ के विवाद या चुनावी रंजिश को सीधे जातिसूचक गालियों और जानलेवा हमले का रूप देकर गंभीर धाराओं में तब्दील कर दिया गया।
16 में से 5 केस में लगी FR: पुलिस की गहन विवेचना में दूध का दूध और पानी का पानी होने लगा। 16 में से कम से कम 5 मुकदमों में पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट (FR/Closure Report) लगाकर अदालत में साबित कर दिया कि आरोप पूरी तरह झूठे और मनगढ़ंत थे।
मुआवजे की मलाई: सोशल मीडिया पर जहाँ 46 लाख रुपये का दावा किया जा रहा था, वहीं समाज कल्याण विभाग के आधिकारिक दस्तावेजों की शुरुआती जांच में भी परिवार को विभिन्न चरणों (FIR और चार्जशीट स्तर) पर लगभग ₹13.12 लाख की सरकारी सहायता राशि जारी होने की पुष्टि हुई।
पैटर्न साफ़ था: एफआईआर दर्ज कराओ, सरकारी योजना के तहत मिलने वाली पहली किस्त लो, फिर चार्जशीट दाखिल होने पर दूसरी किस्त का दावा करो और इस बीच सामने वाले बेगुनाह परिवार को जेल भिजवाकर आर्थिक व सामाजिक रूप से बर्बाद कर दो।
सामान्य वर्ग के परिवारों पर कहर: जमीन बिकी, प्रतिष्ठा गई
जिस परिवार पर 11 मुकदमे लादे गए, उसकी दास्तान रोंगटे खड़े करने वाली है। लगातार मुकदमों, पुलिसिया पेशियों और अदालती तारीखों ने उस परिवार को कर्ज के गर्त में धकेल दिया। वकीलों की फीस भरने और जमानत कराने में लोगों की जमीनें बिक गईं।
सवाल यह उठता है कि क्या सामान्य वर्ग या किसी अन्य नागरिक के पास इन मुकदमों से बचने का कोई सुरक्षा कवच नहीं है? बिना किसी प्राथमिक फॉरेंसिक साक्ष्य के केवल जुबानी आरोपों और गढ़े गए गवाहों के आधार पर बेगुनाहों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया, जबकि झूठा केस दर्ज कराने वाला परिवार सरकारी पैसे से अपनी तिजोरी भरता रहा।
दिल्ली से पहुंची राष्ट्रीय आयोग (NCSC) की टीम, अफसरों की लगाई क्लास
मामले ने जब तूल पकड़ा और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के जरिए शिकायत शीर्ष स्तर पर पहुंची, तो राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय टीम अलीगढ़ पहुंची। आईपीएस अधिकारी व आयोग की डीआईजीपी (DIGP) सनमीत कौर, उपनिदेशक डॉ. आर. स्टालिन और कानूनी सलाहकार नीति चौधरी ने सर्किट हाउस में डीएम, एसएसपी और समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों को तलब कर सभी 16 केस डायरियों और बैंक खातों के लेन-देन को खंगाला।
जांच टीम ने सीधे हस्तपुर गांव में चौपाल लगाकर पीड़ित पक्षों, ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज किए। आयोग के कड़े रुख के बाद स्थानीय प्रशासन ने तुरंत प्रभाव से परिवार को मिलने वाली किसी भी आगामी मुआवजा राशि पर तत्काल रोक लगा दी है।
झूठे गवाहों और फर्जी मुकदमों पर अब आर-पार की कार्रवाई जरूरी
यह मामला केवल अलीगढ़ के एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे देश में कानून के हो रहे दुरुपयोग का जीता-जागता प्रमाण है। कानूनी जानकारों और जागरूक नागरिकों का स्पष्ट मानना है कि जब तक इस सिंडिकेट की जड़ों पर प्रहार नहीं होगा, बेगुनाहों की बर्बादी नहीं रुकेगी:
मुआवजा राशि की पूरी रिकवरी: जिन 5 मामलों में पुलिस क्लोजर रिपोर्ट लगा चुकी है, उनमें सरकार द्वारा दी गई सहायता राशि की पाई-पाई भू-राजस्व (Land Revenue) की तरह कुर्की कर वसूली जाए।
IPC 182 और 211 (अब BNS 217/248) के तहत जेल: झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों और झूठी एफआईआर लिखाने वालों पर प्रशासन सीधे मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेजे।
झूठे गवाहों पर शिकंजा: हर फर्जी मुकदमे में कुछ ‘पेशेवर गवाह’ खड़े किए जाते हैं। जो लोग झूठी गवाही देकर किसी निर्दोष को जेल भिजवाने का षड्यंत्र रचते हैं, उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) और झूठी गवाही (Perjury) के तहत गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
मुआवजा नीति में सुधार: एफआईआर दर्ज होते ही मुआवजा बांटने की व्यवस्था की समीक्षा हो। जब तक अदालत से दोष साबित न हो या कम से कम निष्पक्ष मजिस्ट्रेट जांच पूरी न हो, तब तक सार्वजनिक धन का वितरण न किया जाए, ताकि यह ‘धन उगाही’ का जरिया न बने।
दलितों और वंचितों के आत्मसम्मान और सुरक्षा के लिए बाबा साहेब के संविधान की भावना से बना यह कानून बेहद Upपवित्र है, लेकिन जब चंद अवसरवादी इसे वसूली और बदले की भावना का हथियार बना लेते हैं, तो न केवल निर्दोष पिसते हैं, बल्कि वास्तविक पीड़ितों का हक भी मारा जाता है। अब वक्त आ गया है कि अलीगढ़ मॉडल पर नजीर पेश करते हुए झूठा मुकदमा दर्ज कराने वालों और उनकी झूठी गवाही देने वालों को उसी सलाखों के पीछे भेजा जाए, जहाँ वे सालों से बेगुनाहों को धकेलते आ रहे हैं।
स्रोत: NCSC जांच रिपोर्ट, यूपी पुलिस व मीडिया रिपोर्ट्स

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