!! माँ कूष्मांडा !!
नवरात्रि के दौरान देवी कूष्मांडा की पूजा का चौथा दिन।
नाम— कूष्माण्डा
मनपसंद फूल— लाल रंग का फूल
अर्थ— पूरा जगत माता के पैरों में
नवरात्रि के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा की जाती है , मान्यता है कि माता कूष्मांडा ने अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की थी इसी कारण इन्हें श्रृष्टि की आदिशक्ति भी कहा जाता है। देवी की इस रूप की पूजा करने से और व्रत रखने से श्रद्धालुओ के सभी कष्ट और रोग दूर होते है। इस दिन श्रद्धालुगण पीले या नारंगी रंग का वस्त्र पहनते हैं और देवी को मालपुआ या कद्दू का भोग चढ़ाते हैं।
मंत्र—
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
प्रार्थना—
सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे
स्तुति—
ॐ या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
ध्यान—
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥
भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु , चाप , बाण , पद्म , सुधाकलश , चक्र , गदा , जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्॥
मञ्जीर हार केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारु चिबुकां कांत कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कोमलांङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
स्तोत्र—
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशिनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रिलोकसुन्दरी त्वंहि दुःखशोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
कवच—
हंसरैं में शिर पातु कूष्माण्डै भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा।
पूर्वे पातु वैष्णवी, इन्द्राणी दक्षिणे मम॥
दिग्विदिक्षु सर्वत्रैव पातु कूं बीजं सर्वदावतु।
एतानि विन्दूनां तन्त्रे पातु मां जगदीश्वरी॥
आरती—
!!ॐ श्री गणेशाय नमः!!
कूष्माण्डा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिङ्गला ज्वालामुखी निराली।
शाकम्बरी माँ भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो मां प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँती हो माँ अंबे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥
