दिल्ली में पत्रकारों की हिरासत और कथित अभद्रता के विरोध में आवाज बुलंद, जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने दिया समर्थन
नई दिल्ली। लोकतंत्र में सवाल पूछना पत्रकार का काम है और सवालों का जवाब देना सत्ता तथा व्यवस्था की जिम्मेदारी। लेकिन जब सवालों को कैमरे में कैद करने वाली कलम को ही रोकने की नौबत आ जाए, तो सवाल केवल पुलिस की कार्रवाई पर नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वास्तविक स्थिति पर भी उठने लगते हैं।
दिल्ली में प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और उनके साथ कथित अभद्र व्यवहार के विरोध में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के आसपास पत्रकारों के पैदल मार्च की सूचना सामने आई है। जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस विरोध को समर्थन दिया। यह घटनाक्रम पत्रकारों की सुरक्षा, रिपोर्टिंग की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था के नाम पर अपनाई जाने वाली कार्रवाई की सीमाओं पर बहस को फिर सामने लाता है।
कैमरे से परेशानी है या कैमरे में दिखाई देने वाली सच्चाई से?
10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि प्रेस पहचान-पत्र दिखाने के बावजूद उन्हें रोका गया। कुछ मामलों में मोबाइल फोन और रिपोर्टिंग उपकरणों को लेकर भी शिकायतें सामने आईं। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि सच्चाई केवल आरोपों और सफाई के बीच उलझकर न रह जाए।
व्यवस्था के सामने सवाल सीधा है—यदि कोई पत्रकार कानून तोड़ता है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई कीजिए; लेकिन यदि वह केवल घटनास्थल पर मौजूद रहकर जनता को बता रहा है कि वहां क्या हो रहा है, तो उसकी रिपोर्टिंग को बाधित करने का आधार क्या है?
लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं, गवाह होता है।
विडंबना देखिए, व्यवस्था पारदर्शिता की बात करती है, जवाबदेही का भरोसा देती है और जनता को सूचना का अधिकार भी प्राप्त है। मगर जब कोई पत्रकार उसी जनता के लिए घटनाओं की तस्वीर सामने लाने पहुंचता है, तब यदि उसे ही रोकने या हिरासत में लेने की शिकायतें उठें, तो व्यवस्था को अपने आचरण पर सवालों का सामना करना ही होगा।
यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि प्रेस कार्ड कानून से ऊपर होने का प्रमाणपत्र नहीं है। पत्रकार भी कानून के अधीन हैं। लेकिन कानून का पालन कराने और पत्रकारिता के काम में अनुचित बाधा डालने के बीच की सीमा स्पष्ट होनी चाहिए। पुलिस की कार्रवाई का आधार, उसकी प्रक्रिया और संबंधित पत्रकारों के आरोपों की जांच—तीनों तथ्य सामने आने चाहिए।
प्रेस क्लब के आसपास उठे कदम केवल पैदल मार्च नहीं, जवाबदेही की मांग भी हैं।
पत्रकारों के इस विरोध को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया का समर्थन पत्रकार संगठनों के बीच इस विषय को लेकर चिंता का संकेत है। हालांकि, मार्च में शामिल लोगों की संख्या, आयोजकों और समर्थन संबंधी आधिकारिक विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
आज प्रश्न किसी एक पत्रकार, एक पुलिस अधिकारी या एक संगठन का नहीं है। प्रश्न उस भरोसे का है, जिसके आधार पर जनता मानती है कि घटनाओं की वास्तविक तस्वीर उसके सामने पहुंचेगी। यदि रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार हुआ है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए; और यदि पुलिस के पास कार्रवाई का वैधानिक आधार है, तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
क्योंकि कलम को चुप कराने से सवाल खत्म नहीं होते—वे और तीखे होकर लौटते हैं। कैमरे को रोक देने से दृश्य मिटते नहीं, बल्कि उन पर संदेह और गहरा हो जाता है। लोकतंत्र की असली ताकत सवालों से बचने में नहीं, उनका जवाब देने में है।
