कागजों में भंडार, ज़मीन पर लाचारी – किसान फिर सवालों के बीच

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कागजों में भंडार भरपूर, ज़मीन पर किसान फिर परेशान!

नई दिल्ली । (एजेंसी)केंद्र सरकार भले ही रबी 2025-26 के लिए खाद के “पर्याप्त भंडार” का दावा कर रही हो, लेकिन हकीकत में किसानों की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रहीं। आंकड़ों में 53.08 लाख मीट्रिक टन यूरिया, 21.80 लाख मीट्रिक टन डीएपी, 7.98 लाख मीट्रिक टन एमओपी और 48.38 लाख मीट्रिक टन एनपीकेएस का स्टॉक दिखाया जा रहा है, मगर सवाल यह है कि क्या ये खाद समय पर और सही कीमत पर किसानों तक पहुंच पा रहे ।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि देश आज भी खाद के लिए आयात पर भारी निर्भर है। ऐसे में वैश्विक बाजार में कीमत बढ़ते ही इसका सीधा असर किसानों की जेब पर पड़ता है। सरकार लंबे समझौतों और योजनाओं की बात जरूर कर रही है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर किसानों को डीएपी और अन्य उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर हर सीजन में जूझना पड़ता है।
सरकार ने यूरिया की कीमत 242 रुपये प्रति बैग तय कर रखी है, लेकिन अन्य उर्वरकों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। डीएपी पर अतिरिक्त 3,500 रुपये प्रति टन का बोझ भी आखिरकार किसानों पर ही पड़ता है। यानी सब्सिडी का दावा अपनी जगह, लेकिन लागत का दबाव कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है।
उत्पादन बढ़ाने और नई इकाइयां लगाने की बात भी वर्षों से हो रही है, फिर भी आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अभी दूर दिखाई देता है। आंकड़ों में उत्पादन बढ़ने के बावजूद किसानों को समय पर खाद नहीं मिलना, लंबी कतारें लगना और काला बाजारी जैसी समस्याएं आज भी हकीकत हैं।
साफ है कि सरकार के दावों और किसानों की वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर है। जब तक वितरण व्यवस्था मजबूत नहीं होगी और कीमतों पर वास्तविक नियंत्रण नहीं होगा, तब तक “पर्याप्त भंडार” सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा और किसान हर सीजन में परेशान होता रहेगा।

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