केकड़ी/अजमेर
केकड़ी बजरी प्रकरण अब केवल घटना नहीं बल्कि पुलिस, प्रशासन और माफिया तंत्र के आपसी संबंधों पर जनता की अदालत में खड़ा एक गंभीर सवाल बन चुका है। घटना के बाद कांस्टेबल राजेश मीणा द्वारा जारी किया गया वीडियो जिसमें उसने अपने ही विभाग के उच्च अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए । यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें सच्चाई बोलने वाला पहले कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है और असली ताकतवर को बेदाग निकल दिया जाता है।
पुलिस के बयान सही मानें तो सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जिस रात कथित रूप से राजेश मीणा द्वारा उत्पात, आगजनी और सर्विस रिवाल्वर निकाल कर लोगों को डरा रहा था , उस रात पुलिस और प्रशासन कहां था? यदि वाकई ऐसी गंभीर घटनाएं हुईं, तो उसी समय कार्रवाई क्यों नहीं की गई? राजेश ने जब बजरी माफिया और अपने ही अधिकारियों की जानकारी का वीडियो वायरल किया उसके बाद आनन-फानन में राजेश मीणा का निलंबन—क्या यह न्याय है या केवल दबाव प्रबंधन?
इस पूरे घटनाक्रम में माइनिंग विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। घटना के तुरंत बाद बजरी माफिया को एनओसी मिल जाना कई सवाल खड़े करता है। क्या यह महज संयोग है या पहले से तय खेल? उससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि मौके का वीडियो बनाने वाले सिपाही तक को निलंबित कर दिया गया। क्या अब सच्चाई को रिकॉर्ड करना भी अपराध की श्रेणी में आ गया है?
केकड़ी और बनास नदी क्षेत्र कोई रहस्य नहीं है। वर्षों से खुलेआम हजारों टन बजरी का खनन होता आ रहा है। यह सब प्रशासन की आंखों के सामने होता है । जब मामला सामने आया तो पूरा सिस्टम एक कांस्टेबल को ही आरोपी घोषित करने में लगा दिया । सवाल उठता है—राजेश मीणा ने ऐसा क्या कर दिया कौन है वो दबंग माफिया जिसके सामने पूरा सिस्टम नतमस्तक हो अपने साथी कर्मी के ही खिलाफ हो गया? मूल बजरी माफिया प्रकरण से नजरें फेर कर उसी पर टूट पड़ा?
राजनीतिक चुप्पी भी कम सवालिया नहीं है। केकड़ी के पूर्व विधायक, जो सामान्यतः हर मुद्दे पर मुखर रहते हैं, इस पूरे मामले में मौन साधे हुए हैं। केकड़ी में व्यापारी पर गोली चलने जैसी घटनाओं और कांस्टेबल द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों और उसकी जान को खतरा होने पर भी पूर्व विधायक की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं—यह चुप्पी स्पष्ट देश रही है कि 5 साल तू ,5साल मैं सत्ता और विपक्ष का विरोध केवल जनता को दिखाने के लिए चुनावी मंचों तक सीमित रहता है?
अब तक न तो कॉल डिटेल जांच की गई, न ही आरोपों की निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया गया। बिना एफएसएल रिपोर्ट और ठोस जांच के एकतरफा कार्रवाई पुलिस की साख पर सवाल खड़े करती है। जब आम नागरिक पर कानून की धाराएं तुरंत लग जाती हैं, तो इतने बड़े अवैध खनन नेटवर्क पर नरमी क्यों?
यह प्रकरण केवल केकड़ी का नहीं है। यह देशभर में बढ़ते माफिया वर्चस्व और सिस्टम की कमजोर होती पकड़ का प्रतीक है। यदि आज एक कांस्टेबल को यूं अकेला छोड़ दिया गया, तो कल कोई भी ईमानदार अधिकारी माफियाओं के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं करेगा।
सरकार और पुलिस विभाग के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है। सवाल यह नहीं कि किसे बचाया जाए, बल्कि यह है कि सच क्या है। जनता की अदालत में भरोसा तभी बचेगा, जब निष्पक्ष जांच होगी, माफियाओं पर लगाम लगेगी और अपने ही कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाने की प्रवृत्ति पर विराम लगेगा। समय रहते न्यायोचित कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका खामियाजा व्यवस्था को ही भुगतना पड़ेगा।
