कब समझोगे कि ये शहर तुम्हारा है, नेताओं की जागीर नही
अजमेर । स्मार्टसिटी और विकास के नाम पर हुए खर्च को लेकर एक बार फिर शैलेश गुप्ता के वीडियो ने अजमेर की जनता को जगाने का काम किया उससे बहस तेज हो गई । स्थानीय टिप्पणीकार शैलेश गुप्ता द्वारा वीडियो में सामने लाए गए तथ्यों ने शहर की 25 साल की विकास यात्रा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके अनुसार करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों रुपये योजनाओं में लगाए गए, लेकिन वह मिट्टी (ज़मीदोज़) में मिल गए ।
कभी शाही पहचान रखने वाला अजमेर आज बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता दिख रहा:
शैलेश गुप्ता ने वीडियो में क्रमवार जानकारी देते हुए बताया कि 15 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया फूड कोर्ट जमींदोज हो चुका है। इसी प्रकार क्षेत्र में लगभग 3 करोड़ रुपये खर्च कर लगाए गए रंगीन म्यूजिकल फाउंटेन भी अपेक्षित उपयोग नहीं दे पाए।
पुष्कर घाटी और किंग एडवर्ड मेमोरियल (दयानंद विश्रांतिगृह) में लगाए गए लेजर शो पर भी 3-3 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जो अब शो पीस बनकर रह गये ?
इसके अलावा, एलिवेटेड रोड की मरम्मत पर 40 लाख रुपये खर्च किए । सेवन वंडर जो अब विश्व में आठवां अजूबा बनकर रह गया वह भी जमींदोज हो गया ।
ऐसे कई उदाहरणों के जरिए उन्होंने जनता तक यह संदेश पहुंचाया कि जनता के पैसे का सही उपयोग नहीं हुआ, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि इतने बड़े खर्च के बावजूद न तो किसी जनप्रतिनिधि की जवाबदेही तय हुई और न ही किसी अधिकारी पर कार्रवाई की गई। यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
यदि पिछले 25 वर्षों के समग्र विकास पर नजर डालें, तो बुनियादी सुविधाओं पीने के पानी,अस्पताल की स्थिति चिंताजनक है। शिक्षा के क्षेत्र में कोई ऐसा सरकारी स्कूल सामने नहीं आया जो निजी स्कूलों की गुणवत्ता को चुनौती दे सके। खेल सुविधाओं की बात करें तो शहर में जिला स्तर का भी कोई बड़ा खेल मैदान नहीं है। आम नागरिकों के लिए खुले और निःशुल्क सार्वजनिक स्थानों की कमी भी लगातार महसूस की जा रही है। शहर के प्रमुख पार्क निजी प्रबंधन को दिए जाने के बाद से आम जनता की पहुंच काॅलोनियों के पार्कों तक सीमित रह गई वहां भी अतिक्रमण और अवैध व्यवसायिक निर्माणों के चलते काॅलोनियों में बहन बेटियों का घूमना तक दुश्वार हो गया हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय है। संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है—दीवारों से प्लास्टर झड़ना, बारिश में जलभराव, गर्मी में पंखों की कमी और डॉक्टरों ,मरीजों के कक्षों में पानी टपकने जैसी समस्याएं मरीजों के लिए असुरक्षा का माहौल पैदा कर रही हैं।
वहीं अजमेर के सौंदर्यीकरण पर हुए करोड़ों रुपये खर्च के बावजूद स्थिति संतोषजनक नहीं है। झील के किनारे बनाए गए पाथवे की दीवारों में दरारें, पाथवे पर बंद पड़ी लाइटें,टूटे कैमरे और पानी से आने वाली दुर्गंध इस बात की ओर इशारा करती हैं कि योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीर खामियां रही हैं।

राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो यह भी देखा जा रहा है कि विकास कार्यों की जगह फोटो (मिडिया)ग्राफी प्रतीकात्मक गतिविधियों पर जिम्मेदारों का अधिक जोर दिया जा रहा है। शिलापट्टिकाओं का अनावरण तो हो रहा है, लेकिन जिन सड़कों या परियोजनाओं के नाम पर ये पट्टिकाएं लगाई जाती हैं, वे पूरी हुई या नहीं, इसकी निगरानी का अभाव साफ दिखाई देता है। शीलापट्टिका तो लगी मिलती हैं सड़क गायब !

टूटा केमरा

टूटी दीवार
यह पूरा मुद्दा केवल नेताओं की नाकामी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनता के लिए भी आत्ममंथन का विषय है। बार-बार वही वादे करने वाले नेताजी,वही चेहरे और फिर वही परिणाम—यह चक्र कब तक चलता रहेगा? जानकारों का मानना है कि पिछले 25 वर्षों में शहर ने क्या खोया और क्या पाया, यह अब स्पष्ट रूप से सामने है।
सबसे बड़ा सवाल : शैलेश गुप्ता का यह वीडियो केवल सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री बनकर रह जाएगा, या यह जनता को वास्तविक स्थिति का एहसास कराएगा। आने वाले चुनावों में अजमेर के मतदाता यदि इन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं, तो ही आगे के भविष्य में वास्तविक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।
सुनें शैलेश गुप्ता ने क्या कहा:-
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