नई दिल्ली । (लो एड.) इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि गर्भ में पाँच महीने या उससे अधिक आयु का भ्रूण भी कानून की नजर में एक जीवित बच्चे के समान माना जाएगा। ऐसे में यदि किसी रेलवे दुर्घटना में माँ के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु की भी मृत्यु हो जाती है, तो रेलवे प्रशासन उस अजन्मे बच्चे के लिए भी अलग से मुआवजा देने के लिए बाध्य होगा।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की पीठ ने यह फैसला देते हुए लखनऊ स्थित रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश को आंशिक रूप से संशोधित किया। ट्रिब्यूनल ने पहले केवल गर्भवती महिला की मृत्यु पर ₹8 लाख का मुआवजा दिया था, लेकिन भ्रूण की मृत्यु को अलग से नहीं माना गया था। हाईकोर्ट ने इसे सुधारते हुए दावेदार को भ्रूण की मृत्यु के लिए भी अतिरिक्त ₹8 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया।
मामला 2 सितंबर 2018 का है, जब भानमती नामक महिला मरुधर एक्सप्रेस में चढ़ते समय गिर गई थीं और बाद में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उस समय वह लगभग 8-9 महीने की गर्भवती थीं, जिससे गर्भस्थ शिशु की भी मृत्यु हो गई। अदालत ने कहा कि यह घटना रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124ए के तहत ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ की श्रेणी में आती है, जिससे रेलवे की जिम्मेदारी तय होती है।
कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कानून में ‘भ्रूण’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन न्याय और मानवीय संवेदनाओं के आधार पर ऐसे भ्रूण को एक स्वतंत्र जीवन के रूप में देखा जा सकता है। यही कारण है कि उसकी मृत्यु को माँ की मृत्यु से अलग एक स्वतंत्र घटना माना जाएगा और उसके लिए अलग मुआवजा दिया जाएगा।
यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समाज में अजन्मे जीवन के अधिकारों को भी एक नई पहचान देता है, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने का रास्ता और स्पष्ट हो गया है।
