परिसीमन : जनता को सुविधा या सत्ता के मोहरों के लिए बंटवारा

Spread the love

परिसीमन: लोकतंत्र का संतुलन या सत्ता का जनता पर अतिक्रमण करने का हथियार ?

(खबर वन न्यूज़ वेब पोर्टल | संपादकीय कॉलम)

चुनाव से पहले जब भी परिसीमन की चर्चा शुरू होती है, तो आम आदमी के मन में एक ही सवाल —यह सब अचानक क्यों? क्या सच में यह व्यवस्था सुधारने के लिए होता है या फिर चुनावी मोहरे बिछाने के लिए?

राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनावों से पहले परिसीमन प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं ,धीरे-धीरे ऐसा औज़ार(हथियार) बनता जा रहा है, जिससे समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर कमजोर किया जा सके।

आखिर है क्या परिसीमन

आम भाषा में समझें तो परिसीमन का मतलब है—चुनावी क्षेत्रों की सीमाएँ बदलना। कहा जाता है कि जनसंख्या बढ़ने या घटने के कारण ऐसा करना ज़रूरी होता है, ताकि हर क्षेत्र में लगभग बराबर मतदाता हों और सबको समान प्रतिनिधित्व मिले।सुनने में यह बात ठीक लगती है, लेकिन सवाल यह है कि राजस्थान में परिसीमन कब और कैसे किया जा रहा है?

चुनाव से पहले ही क्यों?

अगर परिसीमन का मक़सद केवल व्यवस्था सुधारना होता, तो इसे चुनावों से काफी पहले और व्यापक चर्चा के साथ किया जाता। लेकिन यहाँ तो तस्वीर उलटी है। चुनाव नज़दीक आते ही सीमाएँ बदली जा रहीं हैं, वार्ड और पंचायतें सत्ता सुविधा के लिए तोड़ी जोड़ी जा रही हैं वहीं जनता को बताया जा रहा है—”यह आपके फायदे के लिए है।”असल में यह फायदे का नहीं, सुविधा का सवाल है—सत्ता की सुविधा।

छोटे-छोटे वार्ड, कमजोर जनता

राजस्थान के कई शहरों और कस्बों में वार्डों को 2000 से 5000 मतदाताओं तक सीमित कर दिया गया है। दावा किया जाता है कि इससे पार्षद जनता के ज़्यादा करीब होगा। हकीकत यह है कि इतनी कम संख्या को डर, दबाव और लालच से काबू में रखना आसान हो जाता हैबड़ी आबादी सवाल पूछती है, छोटी आबादी अक्सर मजबूर होती है। यही कारण है कि समाज को छोटे हिस्सों में बाँटना सत्ता के लिए फायदेमंद होता है।

पंचायतों में ज़मीन का असली खेल

राजस्थान की पंचायतों में सबसे बड़ा मुद्दा ज़मीन का है—गोचर, चारागाह, तालाब और दूसरी सार्वजनिक ज़मीनें। परिसीमन के बाद नई पंचायत बनती है, इससे पुराने जमीनों के विरोध कमजोर हो जाते हैं। नए जनप्रतिनिधि आते हैं और देखते-देखते ज़मीनों पर कब्ज़े शुरू हो जाते हैं। इसे विकास कहा जाता है, तो कभी योजना। लेकिन नुकसान हमेशा गांव और आम लोगों का होता है।

शहरों में अतिक्रमण और वसूली

शहरों में परिसीमन का असर साफ दिखाई देता है। एक ही बस्ती को अलग-अलग वार्डों में बाँट दिया जाता है। नतीजा यह कि कोई भी पार्षद पूरी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता।1

राजस्थान के शहरों में स्थिति साफ तौर पर देखी जा सकती है, जहाँ सड़क, नाली, पानी ,निर्माण नक्शे,भूमि रूपांतरण और बिजली जैसी सुविधाएँ लेने के लिए आम आदमी इधर उधर चक्कर लगाता रहता है । अंत में उसे काम करवाना है तो”लेन-देन” करना पड़ता है ।

राजनीतिक दलों को क्या मिलता है?

परिसीमन से राजनीतिक दलों को कई फायदे होते हैं—अपने समर्थक क्षेत्रों को सुरक्षित कर अपने मोहरे को उस क्षेत्रों से जीत दिलवाना ,विरोधी वोटों को अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर , कम खर्च में आसान जीत मिलती है ।

इसीलिए परिसीमन को लेकर पार्टियां बाहरी विरोध दिखाती आ रही है, लेकिन अंदर ही अंदर सभी अपनी-अपनी गणना में लग जाते हैं और लोकतंत्र के अधिकारों पर अतिक्रमण और सीमाओं का बंटवारा होता रहता है।

जनता को क्या नुकसान?

इस पूरे खेल में जनता की सामूहिक आवाज़ को कमजोर किया है ,जनप्रतिनिधि जवाबदेह नहीं रहते ,जनता से ज़मीन और संसाधन हाथ से निकल जाते हैं ।आम नागरिक धीरे-धीरे सिर्फ़ वोट डालने की मशीन बनता जा रहा है।

आखिर सवाल क्या है?

सवाल परिसीमन के खिलाफ या पक्ष में होने का नहीं है। सवाल है—पारदर्शिता और जन-सहमति का। अगर सीमाएँ जनता की राय के बिना बदली जाएँगी, तो लोकतंत्र सिर्फ़ काग़ज़ों में बचेगा।

आज ज़रूरत है कि परिसीमन पर खुली बहस हो, जवाब मांगे जाएँ और यह सुनिश्चित किया जाए कि यह प्रक्रिया जनता के लिए हो, न कि सत्ता की बिसात बिछाने की सुविधा के लिए।

क्योंकि जब समाज टुकड़ों में बंटेगा, तो लोकतंत्र सबसे पहले टूटेगा जो राजतंत्र बनकर देश को ऐसे दलदल में डाल देगा जहां से निकलना आम जनता के लिए नामुमकिन हो जाएगा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *